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Showing posts from June, 2024

"आ गया है गर्मी का मौसम,"

खानपान में शुरू कर दीजिए ये 5 बदलाव* *----------------------------------* 1. गर्मियों (ज़ायद) में आने वाले बेल कुल कै फलों में पानी की मात्रा काफी होती है, इसलिए इनका सेवन अवश्य करें।जैसे तरबूज, खरबूज, खीरा  ककडीआदि को नियमित लेने से शरीर में पानी के साथ खनिज पदार्थों खनिज-लवणों की भी पूर्ति होती है। 2. गर्मी में सामान्य खाना जैसे दाल, चावल, सब्जी, रोटी आदि खाना ठीक रहता है। गर्मी में भूख से थोड़ा कम खाना चाहिए। इससे आपका हाजमा भी ठीक रहेगा और फुर्ती भी बनी रहेगी। इसके साथ तली हुई चीजों को ज्यादा न खाएं, यह आपका हाजमा बिगाड़ सकते हैं। 3. गर्मियों में शरीर का अधिकांश पानी पसीने के रूप में वाष्पीकृत हो जाता है। इसलिए दिन में कम से कम 4 लीटर पानी पिएं। 4. गर्मी में नारियल पानी, छाछ और लस्सी पीने से भी जल का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। गर्मी के मौसम में तली और मसालेदार चीजें खाने की इच्छा ज्यादा होती है। लेकिन इस मौसम में इन चीजों से बचा जाना ही बेहतर होता है। 5, गर्मी  के मौसम में ज्यादा देर तक धूप में रहने से सन बर्न  होने का खतरा बना रहता है। 6. खाने में बहुत ज्यादा न...

*गर्मी के मौसम में लाभदायक अनाज*

गर्मियों में इन मिक्स अनाज की रोटियां खाने से पेट रहता है ठंडा, Weight Loss में  मैं मिक्स आटे की रोटियां खाने से पेट रहता है ठंडा, Weight Loss में भी मिलेगी मदद। *---------------------------------------------*     भारत की दुनिया को सबसे बड़ी देन है भोजन की विविधता गर्मियों का अनाज सब्जियां फल अलग और सर्दियों का फल सब्जी अनाज अलग सर्दियों के खाने में जहां चिकनाई की मात्र अधिक होती है अनाज गरम तासीर वाले होते हैं जैसे बाजरा मक्का साठी चावल का आटा मंडूआ रागी संवाई आदि वहीं गर्मियों में जौ ज्वार चना आदि आज गर्मियों में खाये जाने वाले भोजन के बिषय में जानतें हैं।  अगर आप इन आटों से बनी रोटी का सेवन करेंगे, तो आपको वजन कम करने और पेट को ठंडा रखने में मदद मिलेगी.  गर्मी में अपने खानपान पर पूरा ध्यान रखना चाहिए. वरना पेट में गर्मी हो सकती है और आपको गैस, पेट में जलन, दस्त, अपच आदि का खतरा हो सकता है. लेकिन अगर आप गर्मियों में खास आटे से बनी रोटियों का सेवन करेंगे, तो आपका पेट ठंडा रहेगा. इसी के साथ आपको वेट लॉस करने में भी मदद मिलेगी. आइए जानते हैं कि कौन-से आटे की रोट...

ऐसे बनाएं गर्मियों के दिनों में रिफ्रेशमेंट ड्रिंक,

दोष रहित हाजमे वाला स्वास्थ्य वर्धक स्वादिष्ट शीतल पेय। गर्मियां आने के साथ ही पानी पीने की जरूरत होने लगती है और इसके साथ ही हम अपने ड्रींक को स्वादिष्ट और हेल्दी बनाने के लिए ऑपशन हैं। तो आप इस  रेसिपी से  स्वादिष्ट ड्रिंक बना सकते हैं, जो आपके शरीर को जल्दी से रिफ्रेश करने के लिए जाना जाता है। इस फेमस इंडियन ड्रिंक में केवल कुछ सामग्री की आवश्यकता होती है और इसे तुरंत बनाया जा सकता है। यहां बताया गया है कि आप इसे घर पर कैसे बना सकते हैं। जलजीरा की सामग्री 1/2 कप पुदीने के पत्ते हरे 40, ग्राम सूखे 5, ग्राम 1/2कपसहजने के पत्ते हरे40, ग्राम सूखे 5, ग्राम 6 बड़े चम्मच नींबू का रस25मिली या 5नींबू 2 चम्मच काला नमक 10, ग्राम 8 कप पानी 2लीटर 2 बड़े चम्मच जीरा भुना हुआ 6, ग्राम 1, चम्मच हरड़ पाउडर 3, ग्राम 1,एक चम्मच नागर मोथा 3, ग्राम बर्फ के टुकड़े आवश्यकता अनुसार 1/2 कप धनिया पत्ती सूखे 40, ग्राम हरे5, ग्राम 1/2च चम्मच काली मिर्च पाउडर यह ओफसनल है 4 बड़े चम्मच चीनी 25, ग्राम चीनी की जगह गुड़ ज्यादा फायदेमंद और स्वादिष्ट है 1 चुटकी हींग 2 बड़े चम्मच इमली बीजरहित या 4आम का पन्ना या...

*हीट स्ट्रोक,(गर्मी मेंआना या लू लगना)*

*भारत उत्तरी गोलार्ध का देश है कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है म ई और जून में सुर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधे पड़ती है जिससे उतरीं गोलार्ध में मौसम गरम हो जाया है इससे मदानी भारत में तेज गर्मी पड़ती है ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब तो तापमान 56डिगरी सेल्सियस से अधिक हो जाता है ऐसे में शरीर में पानी की कमी धूप में शारीरीक मेहनत सन स्ट्रोक का कारण बनती है। *-------------------------* हम सभी धूप में घूमते हैं फिर कुछ लोगों की ही धूप में जाने के कारण अचानक हीट स्ट्रोक क्यों हो जाती है ?  हमारे शरीर का तापमान हमेशा 37° डिग्री सेल्सियस होता है, इस तापमान पर ही हमारे शरीर के सभी अंग सही तरीके से काम कर पाते है । पसीने के रूप में पानी बाहर निकालकर शरीर 37° सेल्सियस टेम्प्रेचर मेंटेन रखता है,  बाड़ी कुलिंग यह मानव शरीर की स्वाभाविक और सतत्  प्रक्रिया है लगातार पसीना निकलते वक्त भी पानी पीते रहना अत्यंत जरुरी और आवश्यक है ।  पानी शरीर में इसके अलावा भी बहुत कार्य करता है, जिससे शरीर में पानी की कमी होने पर शरीर पसीने के रूप में पानी बाहर निकालना टालता है । (बंद कर देता...

स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है जामुन

भारतीय उप महाद्वीप में पाया जाने वाला आम के साथ ही जामुन भी स्वास्थ के लिए लाभ कारी फल है जामुन आम के साथ ही पकता है भारतीय मान्यता यह है आम का बाग जब लगाया जाता है उसमें एक पेड़ जामुन का अवश्य लगाया जाये नहीं तो आम के बाग का रोपण पूर्ण और फलदाई नहीं होता जामुन का फल आम खाने से होने वाले दुष्परिणाम की  प्राकृतिक औषधि है  आम यदि अधिक खालिये हों और पेट में गर्मी हो पित्त वनरहा हो बार बार शौच जाना पडरहा हो तो 8-10जामुन खाने से आम का दुष्प्रभाव ठीक हो जाता है और यदि जामुन अधिक खाली हों तो काला नमक खाना चाहिए। -आश्चर्य की बात तो है कि किसी फल के वजह से किसी देश का नामकरण किया गया ! भारत को जम्बू द्वीप के नाम से भी जाना जाता है और यह नाम जामुन के कारण से है। दरअसल जामुन के कई नाम है और उन्हीं में से एक नाम है जम्बू । भारत में जामुन की बहुतायत रही है । हमारे देश में इसकी पेड़ों की संख्या लाखों-करोड़ों में थीऔर शायद इसी कारण से यह फल हमारे देश का पहचान बन गया। भारतीय माइथोलॉजी के दो प्रमुख केंद्र रामायण और महाभारत में भी यह विशेष पात्र रहा है।भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास में मुख...

ऋतु राज वसन्त। वसंत ऋतु चर्चा

 ( वसंत ऋतु की यदि अंग्रेजी महीनो में गणना करें तो 1५ फरवरी से 1५ अप्रैल तक समझी जाती है वसंत ऋतु में आहार और व्यवहार *क्या हो जिससे स्वास्थ की रक्षा हो। *----------------------------------------* बसंत ॠतु का नाम ध्यान में आते ही पलास और सेमल के वृक्षों पर लदे लाल केशरीया फूल आम के बागों के आती बौर की मादक सुगंध पतझड़ हो गये पेड़ों पर छोटी छोटी पत्तिय जैसे पेड़ों का पुनर जन्म हो रहा हो जैसे प्रकृति अपने सुंदर तम स्वरूप में परिवर्तित हो रही हो मनुष्य ही नहीं पेड़ पौधों पसु पक्षियों में भी उमंग और मादकता जा जाती है । वसंत को ॠतु राज भी कहते हैं मनुष्य और वनस्पतियों के लिए ही यह ॠतु अनुकूल नहीं है यह मौसम हानी कारक विष्णु  के लिए भी अनुकूल है और हम यदि सावधान न रहें तो रोगी हो सकते हैं । *चरक संहिता के अनुसार हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से प्रेरित (द्रवीभूत) होकर कुपित होता है जिससे वसन्तकाल में खाँसी,सर्दी-जुकाम, टॉन्सिल्स में सूजन, गले में खराश, शरीर में सुस्ती व भारीपन आदि की शिकायत होने की सम्भावना रहती है। जठराग्नि मन्द हो जाती है अतः इस ऋतु में...

ग्रीष्म ऋतु चर्चा*

ग्रीष्म ऋतुचर्या का( दर्शन और प्रयोग :)एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आयुर्वेद में ऋतुचर्या किन सिद्धांतों को ध्यान में रखकर तय की गयी होगी?  *--------------------------------------* लगभग 5000 साल पहले तय की गयी ऋतुचर्या क्या आज भी उपयोगी है? संक्षेप में देखें तो पहली बात यह है आयुर्वेद का लोक-पुरुष-साम्य सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि पुरुष लोक के समान है (च.शा.5.3: पुरुषोऽयं लोकसम्मितः) इस सिद्धांत के प्रकाश में देखने पर लोक या पृथ्वी के वातावरण का सीधा सीधा प्रभाव मानव के स्वास्थ्य पर पड़ता है क्योंकि लोक और पुरुष में समानता (च.शा.5.3: लोकपुरुषयोः सामान्यम्) होने से सामान्य-विशेष का सिद्धांत कार्य करता है| अर्थात सामान भावों को सामान भावों से मिलाने पर उस भाव की वृद्धि और असमान भावों को मिलाने पर ह्रास होता है| सत्य बुद्धि तभी प्रकट होती है या अकल तभी आती है जब स्वयं के अंदर प्रकृति को व प्रकृति के अंदर स्वयं को देखा जाये (च.शा.5.7): सर्वलोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके सममनुपश्यतः सत्या बुद्धिः समुत्पद्यते| यहाँ पर लोक से तात्पर्य पूरी दुनिया के वातावरण से है जिसमें छः धातुयें पृथ्वी...

ऋतु परिवर्तन*

 * ऋतु परिवर्तन होने पर स्वास्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी ऋतुचर्या-का ही विषय है ऋ़तु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य सावधानी* *-----------------------*   *अभी तक हमने उत्तरायण एवं दक्षिणायन में आने वाली छह ऋतुओं में किसी व्यक्ति की जीवनचर्या क्या होनी चाहिए, क्या-क्या दोष संभावित हैं, ऋतु विशेष में वातावरण कैसा होता है- इन पर विचार किया। आयुर्वेद पूर्णतः विज्ञानसम्मत है एवं यह बताता है कि शास्त्रोक्त जीवनपद्धति का पालन किया जाए तो किसी प्रकार के रोगों की संभावना नहीं रहती। अभी ऋतु विशेष के अनुसार आहार की हमने विशेष चर्चा नहीं की है। हाँ, ऋतुसंधि एवं ऋतु हरीतकी पर संक्षिप्त टिप्पणी पिछली बार की है। अब मौसम विशेष के अनुसार त्रिदोषों की स्थिति क्या होती है, इस पर इस समापन किस्त में प्रकाश डालेंगे। पंचकर्म प्रकरण की विस्तार से सद्वृत्त के साथ चर्चा बाद में होगी। वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव भिन्न-भिन्न ऋतुओं में होते हैं। आहार भी बदलता रहता है। यही दोषों को प्रभावित करता है। आहार तो हम अपने आप नियंत्रित कर सकते हैं, उपवास आदि से शोधन भी कर सकते हैं, ।       ...

अमलतास का गुलकंद

  गुजराती में ગરમાળો  बोलते हैं ,,बड़ा सुंदर पेड़ होता है  गर्मियों के सीजन में पीले रंग के सुनहरे  फूल आते हैं, पूरा वृक्ष पिले फूलो से बहुत ही मनोहर दिखता है। उनके फूल  बचपन मे बहुत खाते थे।कुछ मीठे के साथ खट्टा स्वाद रहता है, आज  हम उसके फूल से गुलकंद  कैसे बनाएं वो  सीखेंगे, गुलकंद  बनाने की विधि  पहले अमलतास का ताजे  फूल लेकर उसे डाली  से चून कर अलग करें ,और जो भी कचरा है उसको निकाल कर फेंक दे , ओर फूल को अपने पास रख ले,अकेले फूल लेकर ,पानी से  फूलों को साफ करें ,ताकि उस पर लगा हुआ धूल कचरा मिट्टी चला जाए बाद में उसको सुखाले,, उतना ही सुखाना है कि पानी सूख जाए (अगर पानी रह जाये तो फफूंद आएगी।और एकदम सुष्क हो जायेतो गुलकंद नही बनपायेगा )बाद में जितने फूल है उससे दोगुनी शक्कर का पाउडर लेना है, गुलकंद  जिस  तरह से बनाते हैं उसी तरफ से गुलकंद बनाले,, उपयोग  पेट की गर्मी कम करता है और बच्चों के लिए जिनको कबज्ज हो  उनके लिए ,,कोमल प्रकृति के लोगों के लिए बड़े स्वादिष्ट औषधि है ,, हम हर वर्ष बनाते है लीवर...

ऋतु परिवर्तन

आयुर्वेद सरल चिकित्सा * ऋतु परिवर्तन होने पर स्वास्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी ऋतुचर्या-का ही विषय है ऋ़तु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य सावधानी* -----------------------   *अभी तक हमने उत्तरायण एवं दक्षिणायन में आने वाली छह ऋतुओं में किसी व्यक्ति की जीवनचर्या क्या होनी चाहिए, क्या-क्या दोष संभावित हैं, ऋतु विशेष में वातावरण कैसा होता है- इन पर विचार किया। आयुर्वेद पूर्णतः विज्ञानसम्मत है एवं यह बताता है कि शास्त्रोक्त जीवनपद्धति का पालन किया जाए तो किसी प्रकार के रोगों की संभावना नहीं रहती। अभी ऋतु विशेष के अनुसार आहार की हमने विशेष चर्चा नहीं की है। हाँ, ऋतुसंधि एवं ऋतु हरीतकी पर संक्षिप्त टिप्पणी पिछली बार की है। अब मौसम विशेष के अनुसार त्रिदोषों की स्थिति क्या होती है, इस पर इस समापन किस्त में प्रकाश डालेंगे। पंचकर्म प्रकरण की विस्तार से सद्वृत्त के साथ चर्चा बाद में होगी। वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव भिन्न-भिन्न ऋतुओं में होते हैं। आहार भी बदलता रहता है। यही दोषों को प्रभावित करता है। आहार तो हम अपने आप नियंत्रित कर सकते हैं, उपवास आदि से शोधन भी कर सकते हैं, ।   ...

ॠतु चर्चा भाग दो

*ॠतु चर्चा विषय गूढ़ और विस्तृत है इस लिए एक पोस्ट में लिखना संभव नहीं हुआ आप के लिए प्रस्तुत है ॠतु चर्चा का दूसरा भाग:- --------------------------------- - * ऋतु परिचयदिनचर्या के पोस्ट सीरीज में जो कुछ भी बताया गया, वह 24 घंटे (अर्थात दिन और रात्रि) में किये जाने वाला आचरण है। मतलब 24 घंटे में क्या क्या करना चाहिए और क्या क्या नही? *यह पूरी जानकारी आपको दिनचर्या सीरीज से मिल गयी है। अब आगे के लिए फिर ऋतु काल मे क्या क्या करना चाहिए? * भिन्न भिन्न ऋतुओं में भिन्न भिन्न नियम का पालन करके स्वस्थ रह सकते है। जैसे शीतकाल में गर्म पानी से स्नान करना और गर्म कपड़े पहनना अच्छा होता है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल मे ठंडे पानी से नहाना और हल्के कपड़े पहनना चाहिए ये तो साधारण सी बात है उसी प्रकार इन ऋतुओं के कई नियम है जो आपके लिए अति आवश्यक है उन सभी नियमो को इस “ऋतुचर्या” सीरीज के माध्यम से हम आपको बताएंगे।( नोट- जो लोग दिनचर्या वाले भाग को अभी नही पढ़े है *माघ मास से 2-2 महीने के क्रम से 6 ऋतुये होती है। *ये ऋतुये (1)- शिशिर, (2)- वसन्त, (3)- ग्रीष्म, (4)- वर्षा, (5)- शरद, (6)- हेमन्तविश्लेषण- यहा ...

ऋतु चर्या भाग १

आयुर्वेद और मानव स्वास्थ में ऋतुओं का बड़ा महत्व है विशेष रूप से भारतीय उप महाद्वीप में जहां दिसम्बर जनवरी में हाड़ कंपा देने वाली सर्दी पड़ती है वहीं जून और जुलाई में त्वचा को जला देने वाली गर्मी प्रकृति भी अलग-अलग ऋतु में अलग अलग फल सब्जी अनाज और औषधियां  उत्पन्न करती है उन सभी का ऋतु अनुसार आयुर्वेद और भारतीय वांग्मय के अनुरूप सेवन करना स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। -------------------------- ऋतु चर्या का अर्थ है ऋतु के अनुसार ही पथ्यापथ्य का सेवन करना अथवा ऋतु के अनुसार ही चेष्टा और जीवनचर्या का पालन करना. पूर्ण वर्ष को आयुर्वेद में २ काल में विभक्त किया गया है- आदान काल और विसर्ग काल. आदान काल में पृथ्वी का उत्तरी छोर (north pole) सूर्य की तरफ झुक जाता है. पृथ्वी की इस क्रिया के कारण धरती पर सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है. इस कारण इसे उत्तरायण (आयन अर्थात गति) भी कहा जाता है. आदान का अर्थ है 'ले लेना'. ये वह काल है जिसमें सूर्य एवं वायु अपने चरम पर आते हैं. इस काल में सूर्य पृथ्वी की सब उर्जा और ठंडक ले लेता है. अतः इस समय में शरीर में कमज़ोरी आने लगती है. दूसरा काल है विस...

ऋतु परिवर्तन

आयुर्वेद सरल चिकित्सा * ऋतु परिवर्तन होने पर स्वास्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी ऋतुचर्या-का ही विषय है ऋ़तु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य सावधानी* -----------------------   *अभी तक हमने उत्तरायण एवं दक्षिणायन में आने वाली छह ऋतुओं में किसी व्यक्ति की जीवनचर्या क्या होनी चाहिए, क्या-क्या दोष संभावित हैं, ऋतु विशेष में वातावरण कैसा होता है- इन पर विचार किया। आयुर्वेद पूर्णतः विज्ञानसम्मत है एवं यह बताता है कि शास्त्रोक्त जीवनपद्धति का पालन किया जाए तो किसी प्रकार के रोगों की संभावना नहीं रहती। अभी ऋतु विशेष के अनुसार आहार की हमने विशेष चर्चा नहीं की है। हाँ, ऋतुसंधि एवं ऋतु हरीतकी पर संक्षिप्त टिप्पणी पिछली बार की है। अब मौसम विशेष के अनुसार त्रिदोषों की स्थिति क्या होती है, इस पर इस समापन किस्त में प्रकाश डालेंगे। पंचकर्म प्रकरण की विस्तार से सद्वृत्त के साथ चर्चा बाद में होगी। वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव भिन्न-भिन्न ऋतुओं में होते हैं। आहार भी बदलता रहता है। यही दोषों को प्रभावित करता है। आहार तो हम अपने आप नियंत्रित कर सकते हैं, उपवास आदि से शोधन भी कर सकते हैं, ।   ...

*योग *

२१जून 2024 दसवा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर सभी को शुभकामनाएं योग करें स्वस्थ रहें ?  -------------------------------- योग भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित किया गया वह विज्ञान जो बिना औषधि के  जीवन को आरोग्य   प्रदान करता है तथा रोगी होने पर आरोग्य होने में सहायक है मैं योग विज्ञान का विद्यार्थी नहीं हुं योग भारतीय ज्ञान और विज्ञान है तदापि योग का इतना ज्ञान प्रतिएक भारतीय को होना ही चाहिए  जिससे वह अपने जीवन को आरोग्य तथा गतिशील बनाये रख सके। वैदिक विधि से किया गया प्राणायाम और व्यायाम योग कहलाता है जिसमें शवांशन की क्रिया  और विभिन्न शारीरिक क्रियाएं सामिल है। योगा और आयुर्वेद, स्वतः सृजित शरीर को स्वस्थ रखने के लिए और रोगी होने पर रोग मुक्ति के लिए भारतीय मनीषियों द्वारा विकसित की गयी  प्राकृतिक व पौराणिक चिकित्सा पद्धति ( थरेपीज) हैं | जब योग और आयुर्वेद का जन्म हुआ तब मनुष्य के शब्दकोश में कुछ गिने-चुने शब्द ही थे, धर्म (Religion) शब्द की तो उत्पत्ति ही नहीं हुई थी, सर्वत्र धर्म-निरपेक्षता यानी सहजता व सरलता व्याप्त थी | *, योगा और आयुर्वेद ? एक तरह से स...

दिन चर्या के आयुर्वेद सूत्र

आयुर्वेद दिन चर्या एवं स्वास्थ्य विज्ञान के छोटी-छोटी किन्तु बहुमुल्य सूत्र *---------------------------------------------* स्वस्थ रहने के तरीक़े * व्यक्ति स्वस्थ रहना चाहता है , कोई भी अपने जीवन में अस्वस्थता के दर्शन नहीं करना चाहता । दुनियाँ के सबसे बड़े सात डाक्टर हैं , जो सदा आपके साथ हैं । कोई शुल्क नहीं , बस समय का सदुपयोग करना है ।  निम्न बातों का पालन करना है :- (१) सूर्य नारायण भगवान् की किरणें  जो सूर्योदय के समय की हैं , उनका सेवन करें । नेत्रों से दर्शन करें तथा अर्घ्य  प्रदान करें ।  (२) नित्यप्रति रात्रिकाल में 6 से 8 घंटे की नींद अवश्य लें । जल्दी सोना और जल्दी जगाना स्वास्थ्यवर्धक होता है । रात्रि 11 बजे से प्रातः 3 बजे तक का शयन शरीर में अमृत तत्त्व का संचार करता है ।  (३) शुध्द शाकाहारी भोजन समयानुसार लें । जलपान , मध्याह्न , रात्रि व अन्य अल्पाहार का समय निश्चित होना चाहिए । हाथ-पैर धोकर व बैठकर , पालथी लगाकर ही भोजन करें । फलों , हरी सब्ज़ियों व दालों का नित्यप्रति के भोजन में समावेश हो । पतली सब्ज़ीयाँ खाने का अधिक लाभ है ।  (४)अकेला ग...

व्यवस्थित दिन चर्या

सनातन वांग्मय में मनुष्य की दिन चर्या को विस्तार और तथ्यों के आधार पर बताया समझाया गया है जिस के अनुसार आचरण करने से मन बुद्धि और शरीर को स्वस्थ रखने में सहायता मिलती है और रोगों से बचा जा सकता है उनमें से एक है। *---------------------------------*   निद्रा   शयन (सोना) जीवन की महत्त्वपूर्ण क्रिया है , जिसका नियमित होना परम आवश्यक है ।  रात्रि 23-00 बजे से 03-00 बजे के दौरान आपके रक्त संचरण का अधिक भाग लीवर की ओर केन्द्रित होता है । जब लीवर अधिक खून प्राप्त करता है तब उसका आकार बढ़ जाता है । यह महत्त्वपूर्ण समय होता है जब आपका शरीर विष हरण की प्रक्रिया से गुजरता है । आपका लीवर शरीर द्वारा दिन भर में एकत्रित विषाक्त पदार्थों को निष्क्रिय करता है और खत्म भी करता है ।  (१) यदि आप रात्रि में 23-00 बजे सो जाते हैं तो आपके पास अपने शरीर को विषमुक्त करने के लिए पूरे चार घण्टे होते हैं । यदि 24-00 बजे सोते हैं तो 3 घण्टे , 01-00 बजे सोते हैं  तो 2 घण्टे और यदि 02-00 बजे सोते हैं तो केवल एक ही घण्टा विषाक्त पदार्थों की सफाई के लिए मिलता है ।कहने का मतलब यह है कि आप ...

खिल उठे…..अमलतास..

  अमलतास को गोंडी भाषा में रेला मडा, संस्कृत में व्याधिघात, नृप्रद्रुम इत्यादि, गुजराती में गरमाष्ठो, बँगला में सोनालू तथा लैटिन में कैसिया फ़िस्चुला कहते हैं। शब्दसागर के अनुसार हिंदी शब्द अमलतास संस्कृत अम्ल (खट्टा) से निकला है। भारत में इसके वृक्ष प्राय: सब प्रदेशों में मिलते हैं। तने की परिधि तीन से पाँच फुट तक होती है, किंतु वृक्ष बहुत उँचे नहीं होते । शीतकाल में इसमें लगनेवाली, हाथ सवा हाथ लंबी, बेलनाकार काले रंग की फलियाँ पकती हैं। इन फलियों के अंदर कई कक्ष होते हैं जिनमें काला, लसदार, पदार्थ भरा रहता है।वृक्ष की शाखाओं को छीलने से उनमें से भी लाल रस निकलता है जो जमकर गोंद के समान हो जाता है। फलियों से मधुर, गंधयुक्त, पीले कलझवें रंग का उड़नशील तेल मिलता है। पत्तियाँ के गुण - आयुर्वेद में इस वृक्ष के सब भाग औषधि के काम में आते हैं। कहा गया है, इसके पत्ते मल को ढीला और कफ को दूर करते हैं। फूल कफ और पित्त को नष्ट करते हैं। फली और उसमें का गूदा पित्तनिवारक, कफनाशक, विरेचक तथा वातनाशक हैं फली के गूदे का आमाशय के ऊपर मृदु प्रभाव ही होता है, इसलिए दुर्बल मनुष्यों तथा गर्भवती स्त्र...

आदर्श दिनचर्याअपनाकर देखिए, बीमारियों से कोसों दूर रहेगा आपका शरीर !

     अगर हमारे शरीर को स्वस्थ रखना है तो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाना बहुत जरूरी है ताकि वो हमारे शरीर पर हमला करने वाले बैक्टीरिया से लड़ सके. यहां जानिए ऐसे कुछ आयुर्वेदिक नियम जिनको फॉलो करने से इम्यून सिस्टम बूस्ट होता है और शरीर हेल्दी रहता है* *दवा सिर्फ बोतलों और गोलियों में नहीं होती।* *व्यायाम दवा है।* *सुबह की सैर दवा है।* *उपवास दवा है।* *गहरी नींद भी दवा है।* *प्राकृतिक चिकित्सा दवा है।* *नियमित योग करना दवा है।* *सकारात्मकता दवा है।* *हमेशा खुश रहना दवा है।* *हंसी और हास्य भी दवा है।* यज्ञ भी दवा है सभी तो हैं आदर्श दिन चर्या का हिस्सा और स्वस्थ रहने के बहूमूलय सूत्र। हमेशा कहा जाता है कि खुश रहा करो, ये सिर्फ एक वाक्य नहीं है, इसके वास्तव में कई मायने हैं. जो लोग खुश रहते हैं और खुलकर हंसते हैं, उनके शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति सही ढंग से होती है. इससे उनका इम्यून सिस्टम तो बेहतर होता ही है, इसके अलावा हृदय, फेफड़े और मांसपेशियां उत्तेजित होते हैं. मस्तिष्क से एंडोर्फिन हार्मोन निकलते हैं, जिससे तनाव कम होता है और तनाव की वजह से होने वाली तमाम समस्याओं से बच...

*आयुर्वेद और योग*

*आयुर्वेद केवल रोगों की चिकित्सा ही नहीं करता वह शारीरिक और मानसिक विकास पर भी जोर देता है योग प्राणायाम तथा विभिन्न शारीरिक क्रियाएं  आहार विज्ञान दैनिक दिनचर्या  भीआयुर्वेद की वैकल्पिक चिकित्सा के ही अंग है। *---------------------------* मानव मस्तिष्क और शारीरिक शक्ति चुस्ती फुर्ती को सतत अभ्यास और शारीरिक तथा मानसिक गति विधि और योग अभ्यास प्राणायाम विभिन्न शारीरिक गतिविधियों (  एक्सरसाइज )द्वारा बढ़ाया जा सकता है इस लिये प्र य बन्धु बच्चों तथा किशोरों के सरवांगीय विकाश के लिये बोद्धिक और शारीरिक क्रियाओं के लिए प्रेरित करें किसी भी कार्य को बार बार करनै से व्यक्ति को उस कार्य में दक्षता प्राप्त हो जाती है तभी तो कहा है। करत करत अभ्यास के जडमत होत सुजान। पत्थर आवत जात से सिल पर पडत निशान।। माध्वाचार्य वैध चिंतामणी में लिखते हैं और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी यही कहता मानव मस्तिष्क के मुख्य भाग को प्रमस्तिष्क कहा जाता है। यह मस्तिष्क का  सबसे ऊपरी हिस्सा होता है, जो खोपड़ी के ठीक नीचे पाया जाता है। इसमें करोड़ों – अरबों  न्यूरोंस होते है। न्यूरोंस की संख्या ही मनु...

आयुर्वेद में ऋतु चर्या भाग 1

  आयुर्वेद और मानव स्वास्थ में ऋतुओं का बड़ा महत्व है विशेष रूप से भारतीय उप महाद्वीप में जहां दिसम्बर जनवरी में हाड़ कंपा देने वाली सर्दी पड़ती है वहीं जून और जुलाई में त्वचा को जला देने वाली गर्मी प्रकृति भी अलग-अलग ऋतु में अलग अलग फल सब्जी अनाज और औषधियां  उत्पन्न करती है उन सभी का ऋतु अनुसार आयुर्वेद और भारतीय वांग्मय के अनुरूप सेवन करना स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। *--------------------------* ऋतु चर्या का अर्थ है ऋतु के अनुसार ही पथ्यापथ्य का सेवन करना अथवा ऋतु के अनुसार ही चेष्टा और जीवनचर्या का पालन करना. पूर्ण वर्ष को आयुर्वेद में २ काल में विभक्त किया गया है- आदान काल और विसर्ग काल. आदान काल में पृथ्वी का उत्तरी छोर (north pole) सूर्य की तरफ झुक जाता है. पृथ्वी की इस क्रिया के कारण धरती पर सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है. इस कारण इसे उत्तरायण (आयन अर्थात गति) भी कहा जाता है. आदान का अर्थ है 'ले लेना'. ये वह काल है जिसमें सूर्य एवं वायु अपने चरम पर आते हैं. इस काल में सूर्य पृथ्वी की सब उर्जा और ठंडक ले लेता है. अतः इस समय में शरीर में कमज़ोरी आने लगती है. दूसरा काल ह...