ॠतु चर्चा भाग दो
*ॠतु चर्चा विषय गूढ़ और विस्तृत है इस लिए एक पोस्ट में लिखना संभव नहीं हुआ आप के लिए प्रस्तुत है ॠतु चर्चा का दूसरा भाग:-
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* ऋतु परिचयदिनचर्या के पोस्ट सीरीज में जो कुछ भी बताया गया, वह 24 घंटे (अर्थात दिन और रात्रि) में किये जाने वाला आचरण है। मतलब 24 घंटे में क्या क्या करना चाहिए और क्या क्या नही?
*यह पूरी जानकारी आपको दिनचर्या सीरीज से मिल गयी है। अब आगे के लिए फिर ऋतु काल मे क्या क्या करना चाहिए?
* भिन्न भिन्न ऋतुओं में भिन्न भिन्न नियम का पालन करके स्वस्थ रह सकते है। जैसे शीतकाल में गर्म पानी से स्नान करना और गर्म कपड़े पहनना अच्छा होता है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल मे ठंडे पानी से नहाना और हल्के कपड़े पहनना चाहिए ये तो साधारण सी बात है उसी प्रकार इन ऋतुओं के कई नियम है जो आपके लिए अति आवश्यक है उन सभी नियमो को इस “ऋतुचर्या” सीरीज के माध्यम से हम आपको बताएंगे।( नोट- जो लोग दिनचर्या वाले भाग को अभी नही पढ़े है
*माघ मास से 2-2 महीने के क्रम से 6 ऋतुये होती है।
*ये ऋतुये (1)- शिशिर, (2)- वसन्त, (3)- ग्रीष्म, (4)- वर्षा, (5)- शरद, (6)- हेमन्तविश्लेषण- यहा माघ महीने से 2-2 महीने के 6 ऋतुये होती है।लेकिन “सुश्रुत ऋषि” ने दोषों के संचय, प्रकोप के अनुसार 6 अन्य ऋतुओं को भी माना है।
*उन्होंने, भाद्रपद और अश्वनी को वर्षा ऋतु में माना है। कार्तिक एवम मार्गशीर्ष को शरद ऋतु में माना है। पौष और माघ को हेमंत ऋतु में माना है। फाल्गुन एवं चैत्र को वंसन्त ऋतु में माना है। वैशाख एव जेष्ठ को ग्रीष्म ऋतु में माना जाता है। आषाढ़ एव सावन को वर्षा ऋतु में माना जाता है।
*(इसने भाद्र, अश्वनी, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन, चैत, वैशाख, जेष्ठ, आषाढ़, सावन यह 12 नाम मूलतः हिंदी महीनों के नाम है जिस प्रकार अंग्रेजी में जनवरी से लेकर दिसम्बर तक होते है आयुर्वेद में इन्ही महीनों के हिसाब से वर्णन है इसकिये इनका नाम भी लेना आवश्यक है आप इसके द्वारा समझने का प्रयास करिये)
*इसी प्रकार,:-
*शारंगधर ऋषि में ज्योतिष के आधार पर ऋतुओं का विभाजन इस प्रकार किया है- मेष और बृष राशि के संक्रांति का नाम ग्रीष्म ऋतु है।
मिथुन और कर्क राशि के राशि के संक्रांति काल को प्रविट ऋतु माना है। सिंह और कन्या के संक्रांति काल को शरद ऋतु माना जाता है। धनु और मकर की संक्रान्ति को हेमन्त ऋतु माना जाता है। कुम्भ और मीन राशि की संक्रांति को वंसन्त ऋतु कहा जाता है।
*ज्योतिष ग्रन्थो में बृष एवं मिथुन को ग्रीष्म ऋतु में, कर्क और सिंह को वर्षा ऋतु में, कन्या और तुला को शरद ऋतु में, बृश्चिक और धनु को हेमन्त ऋतु में, मकर और कुम्भ को शिशिर ऋतु में, मीन और मेष को वंसन्त ऋतु में माना गया है। विद्वानों की इस बारे में थोड़ी मत भिन्ननता होने के कारण संक्रांति काल को ही ऋतु का ध्रुव बनाना न्याय संगत है।
*( यह सभी नाम मेष, बृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, बृश्चिक, धनु, मीन, मकर, कुम्भ, तुला यह ज्योतिष (एस्ट्रो) की 12 रशिया है जिसके आधार पर भी ऋतुओं का बटवारा किया गया है यह पूर्णयता अंतरिक्ष के आधार पर बाटा गया है जिन्हें यह नही समझ आया कोई बात नही है जल्द ही ज्योतिष के बारे में एक लेख के द्वारा इसको भी समझा दिया जाएगा इस समय इसे यहा जोड़ना इसलिए आवश्यक था क्योंकि ऋतु परिचय के इस भाग में यह भी उसका अंश है)संक्रान्ति सूर्य की गति पर निर्भर होती है। जब फाल्गुन माह के शुरू में मीन संक्रान्ति है, तब फाल्गुन चैत्र को वंसन्त ऋतु माना जाता है।
*जब फाल्गुन के अंत मे मीन संक्रान्ति होती है तो चैत्र वैशाख को वंसन्त ऋतु माना जाता है। इस प्रकार बृष मिथुन को ग्रीष्म, कर्क सिंह को वर्षा, कन्या तुला को शरद, बृश्चिक धनु को हेमंत, मकर कुम्भ को शिशिर माना जाता है।
*जब फाल्गुन में मीन संक्रांति होती है तब फाल्गुन चैत्र को वसंत, वैशाख जेष्ठ को गृष्म, आषाढ़ श्रावण को प्रावट, भादो-क्वार को वर्षा, कार्तिक अगहन को शरद, पुष माघ को हेमंत ऋतु माना जाता है।कश्यप संहिता के अनुसार गंगा के दक्षिण भाग में जल की वर्षा अधिक होती है। अतः दक्षिण में प्रावट और वर्षा दो ऋतुये होती है। हिमालय पर्वत क्षेत्र में शीत (ठंड) अधिक होती है। इसलिए हेमन्त और शिशिर दो ऋतुये होती है। आयुर्वेद में यह शिद्धान्त है कि दोष का संचय जिस ऋतु में होता है, उससे अगली ऋतु में उसका प्रकोप होता है। तथा उससे उससे आगे की ऋतु में उसका प्राशय होता है। यदि शिशिर ऋतु को लेकर ऋतु माना जाय तो हेमंत में संचित कफ को शिशिर में कुपित होना चाहिए। पर यह प्रत्यक्ष में दिखाई देता है कि हेमंत का प्रकोप वंसन्त में ही होता है। इस पक्ष में शिशिर में किसी भी दोष का संचय एवं प्रकोप नही होता है। इसलिए आयुर्वेद के विद्ववानों ने प्रावृट ऋतु को लेकर 6 ऋतुओं को माना है। उनके अनुसार ग्रीष्म में बात का संचय, प्रावृट में प्रकोप और वर्षा में उपशम, कफ का हेमंत में संचय, वंसन्त में प्रकोप एवं ग्रीष्म में उपसम होना माना जाता है।
*जिस पक्ष में शिशिर वंसन्त ऋतु का जो वर्णन किया गया है, वह संक्रांति के अनुसार किया गया है। कुछ विद्वान गर्मी सर्दी वर्षा 3 ऋतु को ही मानते है। आयुर्वेद में दोष संचय के अनुसार 6 ऋतुये मानी जाती है।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
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