*ऋतु परिवर्तन*



* ऋतु परिवर्तन होने पर स्वास्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी ऋतुचर्या-का ही विषय है ऋ़तु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य सावधानी*

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  *अभी तक हमने उत्तरायण एवं दक्षिणायन में आने वाली छह ऋतुओं में किसी व्यक्ति की जीवनचर्या क्या होनी चाहिए, क्या-क्या दोष संभावित हैं, ऋतु विशेष में वातावरण कैसा होता है- इन पर विचार किया। आयुर्वेद पूर्णतः विज्ञानसम्मत है एवं यह बताता है कि शास्त्रोक्त जीवनपद्धति का पालन किया जाए तो किसी प्रकार के रोगों की संभावना नहीं रहती। अभी ऋतु विशेष के अनुसार आहार की हमने विशेष चर्चा नहीं की है। हाँ, ऋतुसंधि एवं ऋतु हरीतकी पर संक्षिप्त टिप्पणी पिछली बार की है। अब मौसम विशेष के अनुसार त्रिदोषों की स्थिति क्या होती है, इस पर इस समापन किस्त में प्रकाश डालेंगे। पंचकर्म प्रकरण की विस्तार से सद्वृत्त के साथ चर्चा बाद में होगी। वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव भिन्न-भिन्न ऋतुओं में होते हैं। आहार भी बदलता रहता है। यही दोषों को प्रभावित करता है। आहार तो हम अपने आप नियंत्रित कर सकते हैं, उपवास आदि से शोधन भी कर सकते हैं,

      * परंतु जो वातावरण के घटक हैं वे सीधे हमारी त्वचा, श्वसन संस्थान, रक्तवाही संस्थान पर प्रभाव डालकर सारे शरीर को प्रभावित करते हैं।

वातावरण का वात पर प्रभाव- तीन प्रकार के प्रभाव वात नामक दोष पर पड़ते हैं और यही बीमारी के हेतु बन जाते हैं। ये हैं वात क्षय, वात प्रकोप एवं वात प्रशमन। क्षय अर्थात एकत्र हो जाना, प्रकोप अर्थात बढ़ जाना एवं प्रशमन अर्थात घट जाना।

    *  वात क्षय- ग्रीष्म ऋतु में जब शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है एवं पाचन क्षमता भी कम हो जाती है, मनुष्य पसीने से भी पानी को गँवाता है एवं शरीर से एक प्रकार से जलतत्त्व (फ्ल्युड एवं इलेक्ट्रोलाइट्स) कम होता चला जाता है। इससे वात एकत्र होता चला जाता है। भोजन में शुष्कता एवं हलकापन भी वात क्षय बढ़ाते हैं, पंरतु ग्रीष्म के प्रभाव से यह इतना अधिक नहीं होता कि वात प्रकुपित हो जाए।

       *वात प्रकोप- वर्षा ऋतु में पाचनशक्ति एवं सामान्य शक्ति और अधिक कम हो जाती है। गरमी से ठंढक में अचानक परिवर्तन एक ही दिन में कई बार होता है इससे वात एकत्र होकर प्रकोप की दिशा में चला जाता है। आयुर्वेद के निष्णात विद्वान इस तथ्य से परिचित हो उपचार करते हैं।

    * वात प्रशमन- शरद ऋतु में आद्र्रता एवं गरमी का प्रभाव वातावरण में अधिक होता है। इसलिए शरदकाल में बढ़ा हुआ वात स्वतः घट जाता है एवं सात्मीकरण (होमियोस्टेसिस) की स्थिति आ जाती है।

वातावरण का पित्त पर प्रभाव- पित्त पर भी पित्त क्षय, पित्त प्रकोप एवं पित्त प्रशमन नामक तीन प्रभाव पड़ते है। ये अलग-अलग ऋतु में अलग-अलग प्रभाव डालते हैं इसीलिए आहार, औपधि, जीवनचर्या अलग-अलग रखनी होती है। 

     * पित्त क्षय-ग्रीष्म का आतप शरीर मे गरमी का अनुपात बढ़ाकर इसे थका देता है। शरीर की शक्ति एवं पाचनशक्ति वर्षा के आगमन के साथ और भी कम हो जाती है। पानी की शुद्धता भी बरसाती जल के कारण संदिग्ध हो जाती है। स्वाद में परिवर्तन एवं अपच के कारण पित्त एकत्र होने लगता है एवं यह स्थिति पूरे वर्षाकाल व ग्रीष्म की पराकाष्ठा के काल में बनी रहती है। यदि वातावरण में ठंढक रहे तो पित्त क्षय नहीं होता।

पित्त प्रकोप- यह स्थिति शरदकाल में आती है, जब वर्षा के तुरंत बाद गरमी का प्रभाव तीव्रतम स्थिति में कुछ समय के लिए आता है। इससे एकत्र पित्त प्रकुपित हो उठता है एवं कभी-कभी उसका प्रभाव अधिक भी दिखाई देने लगता है।

   * पित्त प्रशमन- हेमंत के आगमन के साथ ही वातावरण में भी मधुरता एवं भोज्य पदार्थों में मधुर रस का बाहुल्य, ऋतु की ठंढक के साथ पित्त को शांत कर देता है।

*वातावरण का कफ पर प्रभाव-त्रिदोषों में कफ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इससे क्राॅनिक रोग जन्म लेते हैं, यदि ऋतु अनुसार कफ क्षय, प्रकोप एवं प्रशमन का ध्यान न रखा जाए।

   * कफ क्षय- हेमंत में स्वाभावतः भूख अधिक लगती है, शरीर में ताकत भी होती है। खाने-पीने की आदतें बदल जाती हैं और शिशिर ऋतु (जाती हुई ठंढक) तक जारी रहती हैं। उस समय पाचनशक्ति, कम होने लगती है। वातावरण की ठंढक एवं न्यून पाचनशक्ति, परंतु आहार अधिक होने से कफ क्षय होने लगता है, अर्थात कफ एकत्र हो जाता है।

    * कफ प्रकोप- वसंत का आगमन संचित कफ को पिघला देता है और नतीजा निकलता है, प्रकुपित कफ व उससे पैदा हुए रोगों के रूप में।

कफ प्रशमन- गरमी के आगमन के साथ ही संचित, प्रकुपित कफ स्वतः शांत हो जाता है। यहाँ यह कहना जरूरी है कि ऋषियों की यह सब प्रतिपादित     

  *  हाइपोथीसिस-परिकल्पनाएँ भोगे हुए यथार्थ है एवं तब के हैं, जब न हीटर, एयरड्रापर, एयर कंडीशनर्स आदि होते थे। आज ये हैं तो दोष और ज्यादा हैं, क्योंकि कुसमय का ऋतु परिवर्तन दिन में कई-कई बार होता है एवं जीवनशैली में खान-पान की विकृतियाँ जुड़ गई हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि ये त्रिदोष शरीर को अधिक प्रभावित करेंगे और रोगी बनाएँगे। जीवनशैली के रोग (लाइफ स्टाइल disorder) इसीलिए आज ज्यादा हैं।

दोष शोधनम्- पंचकर्मों द्वारा शरीर का त्रिदोषों से शोधन किया जा सकता है। कफ दोष को वसंत ऋतु में वमन द्वारा, पित्त दोष को छोटी आँतों से शरद ऋतु में विरेचन द्वारा तथा वात दोष को बड़ी आँतों से स्थापन वस्ति द्वारा वर्षा ऋतु में संपन्न कर मिटाया जा सकता है। ये पंचकर्म प्रकोप की स्थिति में ही करना ठीक रहते हैं, परंतु ये एकत्र न होने पाएँ ऐसी सावधानी रखी जाए। इसके लिए जिस ऋतु में इनका प्रकोप होता है या होने की संभावना रहती है, उसके प्रारंभ में ही पंचकर्म कर लिए जाएँ तो प्रकोप की संभावना नहीं होती। शोधन तब नहीं करना चाहिए, जब ऋतु अपनी पूर्ण परिपक्वावस्था में होती है एवं शरीर भी कमजोर होता है।

          *  हेमंत व शिशिर ऋतु में उचित है कि तैल मालिश (स्नेहन) नियमित रूप से की जाए एवं इसके लिए वातहर औषधियों का तैल (बलादि तैंल, नारायण तैल) का प्रयोग किया जाए। वसंत ऋतु में नीम तैल, सरसों तैल या शीशम तैल से गरम मालिश की जाए। साथ ही गरम रेत के थैलों द्वारा स्वेदन भी किया जाए। वमन एवं नस्य भी किया जा सकता है। ग्रीष्म ऋतु में वातहर-पित्तहर स्नेहन घी की मालिश से करना चाहिए। वर्षा ऋतु में स्नेहन एवं विरेचन की ही अनुमति है। शारद ऋतु में औषधियुक्त घी (तिक्त घी) से स्नेहन किया जाए, हलका स्वेदन तथा कुटकी, हरीतकी, शुंठी, आमलकी द्वारा विरेचन किया जाए। ये उपाय परीक्षित हैं, सिद्ध हैं एवं किसी भी रोग से व्यक्ति को बचाने में सक्षम हैं। हम यह फिर बता दें कि यहाँ पंचकर्म की संक्षिप्त चर्चा ही ऋतुचर्या के संदर्भ में कही गई है।

  * ऋतु विपर्यय- आज ग्लोबल वार्मिग के कारण, हमारी जीवनचर्या बदल जाने के कारण ऋतुओं में वे प्रभाव नहीं हैं, जो उनके स्वाभाविक गुण हुआ करते थे। मई में ओले गिरना, बहुत ज्यादा ठंढक एवं शिशिर, शरद में गरम मौसम बहुतायत से देखने को मिल रहा है। यह बदला ऋतु का मिजाज ही रोगों को जन्म देता है, शरीर की जीवनीशक्ति की जमकर परीक्षा लेता है। इसका प्रभाव कृषि, पर्यावरण, उत्पन्न होने वाली शाक-सब्जियों, फलादि पर भी होता है तथा ग्रहण किए जाने पर ये भी गलत प्रभाव डालते हैं। इस पर आयुर्वेद के मनिशीयो ऋषियों ने संकेत मात्र किया था परन्तु आज इसी विषय पर पूरी दुनिया का स्वास्थ्य विज्ञान रोज नये प्रयोग कर रहा है  , आज यही सर्वाधिक चर्चित विषय बन गया है।


"ऋतु चर्या भाग १*


आयुर्वेद और मानव स्वास्थ में ऋतुओं का बड़ा महत्व है विशेष रूप से भारतीय उप महाद्वीप में जहां दिसम्बर जनवरी में हाड़ कंपा देने वाली सर्दी पड़ती है वहीं जून और जुलाई में त्वचा को जला देने वाली गर्मी प्रकृति भी अलग-अलग ऋतु में अलग अलग फल सब्जी अनाज और औषधियां  उत्पन्न करती है उन सभी का ऋतु अनुसार आयुर्वेद और भारतीय वांग्मय के अनुरूप सेवन करना स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है।

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ऋतु चर्या का अर्थ है ऋतु के अनुसार ही पथ्यापथ्य का सेवन करना अथवा ऋतु के अनुसार ही चेष्टा और जीवनचर्या का पालन करना. पूर्ण वर्ष को आयुर्वेद में २ काल में विभक्त किया गया है- आदान काल और विसर्ग काल. आदान काल में पृथ्वी का उत्तरी छोर (north pole) सूर्य की तरफ झुक जाता है. पृथ्वी की इस क्रिया के कारण धरती पर सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है. इस कारण इसे उत्तरायण (आयन अर्थात गति) भी कहा जाता है. आदान का अर्थ है 'ले लेना'. ये वह काल है जिसमें सूर्य एवं वायु अपने चरम पर आते हैं. इस काल में सूर्य पृथ्वी की सब उर्जा और ठंडक ले लेता है. अतः इस समय में शरीर में कमज़ोरी आने लगती है. दूसरा काल है विसर्ग काल जिसमे पृथ्वी का दक्षिण छोर सूर्य की ओर मुखरित होता है. इस लिए सूर्य की गति  दक्षिण की ओर होती है. इसलिए ये दक्षिणायन भी कहा जाता है. इसे विसर्ग काल कहा जाता है जिसका अर्थ है 'प्रदान करना'. इस काल में सूर्य धरती को उर्जा प्रदान करता है.

 

 विसर्ग काल में चंद्र प्रधान होता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो यह संपूर्ण धरा पर नियंत्रण किए हुए हैं. सब वनस्पति और प्राणियों को चंद्र पोषण प्रदान करता है. धरती को मेघ, वर्षा और पवन के कारण ठंडक मिलती है. एक वर्ष में दो आयन होते हैं- उत्तरायण और दक्षिणायन एवं इनके कारण वर्ष में ६ ऋतु होती हैं और हर काल में ३ ऋतु होती है. आदान काल में- शिशिर, वसंत और ग्रीष्म जबकि विसर्ग काल में वर्षा, शरत और हेमंत. हर ऋतु दो माह की अवधि लिए हुए है.

 

आदान काल (उत्तरायण)  शिशिर  माघ, फाल्गुन  15 जनवरी-15 मार्च  ठंडी एवं ओसपूर्ण ऋतु

 

वसंत  चैत्र, वैसाख  15 मार्च- 15 मई  वसंत

 

 ग्रीष्म  ज्येष्ठ, आषाढ़  15 मई- 15 जुलाई  ग्रीष्म/गर्मी

 

विसर्ग काल (दक्षिणायन)  वर्षा  श्रावण, भद्रपद  15 जुलाई- 15 सितंबर  सावन/वर्षा

 

शरत  आश्विन, कार्तिक  15 सितंबर- 15 नवंबर  शरद / पतझड़

 

हेमंत  मार्गशीर्ष, पौष  15 नवंबर - 15 जनवरी  शीत/ सर्दी

 

आयुर्वेद में शॅडरस  (six tastes) का वर्णन है- तिक्त (bitter) , कशाय (astringent), कटु

(pungent), आम्ल (sour), लवन (salt), मधु (sweet).shath ras six taste ayurveda  lifestyleहर ऋतु का एक प्रधान रस होता है. जिस ऋतु का जो प्रधान रस है, उसी रस के पदार्थों का अधिक सेवन उस ऋतु में करना स्वास्थ्य के लिए हितकर है.

 

शिशिर  माघ, फाल्गुन  15 जनवरी-15 मार्च  ठंडी एवं ओसपूर्ण ऋतु  तिक्त (bitter)

 

वसंत  चैत्र, वैसाख  15 मार्च- 15 मई  वसंत  कशाय (astringent)

 

 ग्रीष्म  ज्येष्ठ, आषाढ़  15 मई- 15 जुलाई  ग्रीष्म/गर्मी  कटु (pungent)

 

वर्षा  श्रावण, भद्रपद  15 जुलाई- 15 सितंबर  सावन/वर्षा  आम्ल (sour)

 

शरत  आश्विन, कार्तिक  15 सितंबर- 15 नवंबर  शरद / पतझड़  लवन (salt)

 

हेमंत  मार्गशीर्ष, पौष  15 नवंबर - 15 जनवरी  शीत/ सर्दी  मधु (sweet)

 

ऋतु एवं तीन दोष

 

वात दोष : ग्रीष्म ऋतु में एकत्रित होता है जब शोषण करने वाली गर्मी में पाई जाती है और वर्षा ऋतु के काल में यह पाचन क्रिया को कमज़ोर कर देती है. वातावरण में भी अम्लीय और वातज प्रकोप देखने को मिलता है जब सूखी धरती पर बारिश पड़ने से फँसी हुई वायु धरती से निकलती है तथा धरती की सतह को अम्लीय बना देती हैं. पित्त दोष: पित्त दोष वर्षा ऋतु में एकत्रित हो जाता है तथा शरत ऋतु के अम्लीय वातावरण में इसका प्रकोप पाचन क्रिया में आई कमज़ोरी के रूप में सामने आता है. यह वर्षा ऋतु के बाद गर्मी के पुनः प्रकट होने पर शरीर में बढ़ कर विकृति पैदा करता है. कफ दोष: शीत ऋतु में शरीर में एकत्रित होती है जब ठंडक और नमी दोनो वातावरण में पवन, मेघ एवं वर्षा के कारण अधिक मात्रा में हो जाते हैं. यह शरीर में ग्रीष्म ऋतु में बढ़ जाता है जब गर्मी के कारण यह पिघलने लगता है.

 

६ ऋतु और उनमें पथ्यापथ्य एवं जीवनचर्या ।

 

शिशिर/हेमंत ऋतु पथ्यापथ्य: मीठे, खट्टे और लवन युक्त पदार्थ लेना इस ऋतु में हितकर है. हेमंत ऋतु में पाचन क्रिया प्रखर हो जाती है. बढ़ा हुआ वात ठंड के कारण अवरोधित हो जाता है और यह शरीर में धातुयों का नाश कर सकता है. अधिक मीठे, अम्लीय और तिक्त पदार्थों का सेवन हितकर है. गेहूँ, बेसन, दूध से बने पदार्थ, गन्ने  के रस से बने पदार्थ, मकाई, खाद्य तेल का सेवन इस ऋतु में हितकर है. जीवनचर्या: तेल द्वारा की गयी मालिश, केसर, कुमकुम अथवा बेसन से बना उब्वर्तन का प्रयोग करना, नियमित हल्का व्यायाम, नीत्यप्रति धूप का सेवन हितकारी है. चर्म, रेशम और ऊन से बने कपड़ों को पहनना इस ऋतु में उचित है.

 

वसंत ऋतु इस ऋतु में सूर्य की तीक्ष्णता बढ़ने से कफ पिघलने लगता है जिस कारण शरीर की अग्नि ख़ास तौर पर जठराग्नि मंद पड़ जाती है. पथ्यापथ्य: जौ, शहद, कच्चे आम का  पन्ना रस लेना इस ऋतु में हितकर है. किण्वित आसव, अरिस्ट अथवा काढ़ा या फिर गन्ने का रस लेना इस ऋतु में लाभकारी है. मुश्किल से पचने वाले ठोस , ठंडे, मीठे, अम्लीय, वसायुक्त, पदार्थ नही लेने चाहिए. जीवनचर्या: व्यायाम, सुखी घर्षण वाली मालिश, नास्यमालिश के बाद कपूर, चंदन और कुमकुम-युक्त पानी से स्नान, इस ऋतु में करने योग्य है. इस ऋतु में दिन में अतिरिक्त स्नान नही करना चाहिए.

 

ग्रीष्म ऋतु इस ऋतु में सूर्य की किरणों की तीक्ष्णता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है. कफ में कमी आ जाती है तथा वात लगातार बढ़ता है. पथ्यापथ्य: मीठे, हल्के और तरल पदार्थ लेना हितकर है.  ठंडे पानी का सेवन गर्मी के समय हितकारी है केवड़ा गुलाब बुरांस का अर्क शहतूत का शरबत सोंफ का अर्क दही और लस्सी नारियल पानी . ठंडाई और पानक पंचकर जो पाँच प्रकार के मधुर पदार्थों से बना है सत्तू जो भुनें जौ और चौथाई चने के आटे से बना हो, इनका सेवन करना चाहिए. शराब का सेवन इस ऋतु में निषिद्ध है क्योंकि इससे शरीर में कमज़ोरी और जलन उत्पन्न होती है. जीवनचर्या: शरीर को चंदन का लेप लगाकर स्नान करने से इस ऋतु में लाभ मिलता है. ठंडी जगह पर वास करना उचित है तथा हल्के वस्त्र धारण करना उपयुक्त रहता है. ।

 

वर्षा ऋतु इस ऋतु में पाचन शक्ति और भी क्षीण हो जाती है. सब दोषों की विकृति के कारण पाचन क्रिया की कमज़ोरी अधिक बढ़ जाती है. इसलिए जठराग्नि को प्रदीप्त करना तथा दोषों का शमन करना आयुर्वेद में सर्वथा महत्वपूर्ण है. पथ्यापथ्य: जठराग्नि को प्रदीप्त करने के लिए आसानी से पचने वाले आहार का सेवन करना चाहिए. दालें, सब्जियों का सूप, पुराना अन्न, पतला  दलिया  मूंग दाल मसूर दाल खिचड़ी तुरही चिचिंडा इस ऋतु में लिया जा सकता है. जीवनचर्या: पंचकर्म की शुद्धि क्रियाएँ, सुगंधियों का प्रयोग भी इस ऋतु में करने योग्य है. दिन में सोना, अत्यधिक थकान और धूप में घूमना दही दोपहर में खाना लस्सी बैल शर्बत इस ऋतु में वर्जित कार्य हैं.

 

 शरत ऋतु वर्षा ऋतु में पित्त का सन्चय शरीर में होता है. भोजन में तिक्त, मधुर, कशाय पदारतों का सेवन करना हितकर है. पथ्यापथ्य: आसानी से पचने वाले भोजन जैसे चावल, हरा चना, आमला, शहद, शर्करा का सेवन हितकर है. भारी, गरिष्ट भोजन का सेवन, दही, तेल और शराब का सेवन इस ऋतु में वर्जित है. जीवनचर्या: चंदन के साथ उद्वर्तन, गर्म पानी से स्नान और मोती से बनी आभूषण प्रयोग करना इस ऋतु में सार्थक है.


 

*ॠतु चर्चा विषय गूढ़ और विस्तृत है इस लिए एक पोस्ट में लिखना संभव नहीं हुआ आप के लिए प्रस्तुत है ॠतु चर्चा का दूसरा भाग:-

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* ऋतु परिचयदिनचर्या के पोस्ट सीरीज में जो कुछ भी बताया गया, वह 24 घंटे (अर्थात दिन और रात्रि) में किये जाने वाला आचरण है। मतलब 24 घंटे में क्या क्या करना चाहिए और क्या क्या नही?

 

*यह पूरी जानकारी आपको दिनचर्या सीरीज से मिल गयी है। अब आगे के लिए फिर ऋतु काल मे क्या क्या करना चाहिए?

* भिन्न भिन्न ऋतुओं में भिन्न भिन्न नियम का पालन करके स्वस्थ रह सकते है। जैसे शीतकाल में गर्म पानी से स्नान करना और गर्म कपड़े पहनना अच्छा होता है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल मे ठंडे पानी से नहाना और हल्के कपड़े पहनना चाहिए ये तो साधारण सी बात है उसी प्रकार इन ऋतुओं के कई नियम है जो आपके लिए अति आवश्यक है उन सभी नियमो को इस ऋतुचर्यासीरीज के माध्यम से हम आपको बताएंगे।( नोट- जो लोग दिनचर्या वाले भाग को अभी नही पढ़े है

 

*माघ मास से 2-2 महीने के क्रम से 6 ऋतुये होती है।

 

*ये ऋतुये (1)- शिशिर, (2)- वसन्त, (3)- ग्रीष्म, (4)- वर्षा, (5)- शरद, (6)- हेमन्तविश्लेषण- यहा माघ महीने से 2-2 महीने के 6 ऋतुये होती है।लेकिन सुश्रुत ऋषिने दोषों के संचय, प्रकोप के अनुसार 6 अन्य ऋतुओं को भी माना है।

*उन्होंने, भाद्रपद और अश्वनी को वर्षा ऋतु में माना है। कार्तिक एवम मार्गशीर्ष को शरद ऋतु में माना है। पौष और माघ को हेमंत ऋतु में माना है। फाल्गुन एवं चैत्र को वंसन्त ऋतु में माना है। वैशाख एव जेष्ठ को ग्रीष्म ऋतु में माना जाता है। आषाढ़ एव सावन को वर्षा ऋतु में माना जाता है।

 

*(इसने भाद्र, अश्वनी, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन, चैत, वैशाख, जेष्ठ, आषाढ़, सावन यह 12 नाम मूलतः हिंदी महीनों के नाम है जिस प्रकार अंग्रेजी में जनवरी से लेकर दिसम्बर तक होते है आयुर्वेद में इन्ही महीनों के हिसाब से वर्णन है इसकिये इनका नाम भी लेना आवश्यक है आप इसके द्वारा समझने का प्रयास करिये)

 

*इसी प्रकार,:-

 

*शारंगधर ऋषि में ज्योतिष के आधार पर ऋतुओं का विभाजन इस प्रकार किया है- मेष और बृष राशि के संक्रांति का नाम ग्रीष्म ऋतु है।

मिथुन और कर्क राशि के राशि के संक्रांति काल को प्रविट ऋतु माना है। सिंह और कन्या के संक्रांति काल को शरद ऋतु माना जाता है। धनु और मकर की संक्रान्ति को हेमन्त ऋतु माना जाता है। कुम्भ और मीन राशि की संक्रांति को वंसन्त ऋतु कहा जाता है।

*ज्योतिष ग्रन्थो में बृष एवं  मिथुन को ग्रीष्म ऋतु में, कर्क और सिंह को वर्षा ऋतु में, कन्या और तुला को शरद ऋतु में, बृश्चिक और धनु को हेमन्त ऋतु में, मकर और कुम्भ को शिशिर ऋतु में, मीन और मेष को वंसन्त ऋतु में माना गया है। विद्वानों की इस बारे में थोड़ी मत भिन्ननता होने के कारण संक्रांति काल को ही ऋतु का ध्रुव बनाना न्याय संगत है।

*( यह सभी नाम मेष, बृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, बृश्चिक, धनु, मीन, मकर, कुम्भ, तुला यह ज्योतिष (एस्ट्रो) की 12 रशिया है जिसके आधार पर भी ऋतुओं का बटवारा किया गया है यह पूर्णयता अंतरिक्ष के आधार पर बाटा गया है जिन्हें यह नही समझ आया कोई बात नही है जल्द ही ज्योतिष के बारे में एक लेख के द्वारा इसको भी समझा दिया जाएगा इस समय इसे यहा जोड़ना इसलिए आवश्यक था क्योंकि ऋतु परिचय के इस भाग में यह भी उसका अंश है)संक्रान्ति सूर्य की गति पर निर्भर होती है। जब फाल्गुन माह के शुरू में मीन संक्रान्ति है, तब फाल्गुन चैत्र को वंसन्त ऋतु माना जाता है।

*जब फाल्गुन के अंत मे मीन संक्रान्ति होती है तो चैत्र वैशाख को वंसन्त ऋतु माना जाता है। इस प्रकार बृष मिथुन को ग्रीष्म, कर्क सिंह को वर्षा, कन्या तुला को शरद, बृश्चिक धनु को हेमंत, मकर कुम्भ को शिशिर माना जाता है।

*जब फाल्गुन में मीन संक्रांति होती है तब फाल्गुन चैत्र को वसंत, वैशाख जेष्ठ को गृष्म, आषाढ़ श्रावण को प्रावट, भादो-क्वार को वर्षा, कार्तिक अगहन को शरद, पुष माघ को हेमंत ऋतु माना जाता है।कश्यप संहिता के अनुसार गंगा के दक्षिण भाग में जल की वर्षा अधिक होती है। अतः दक्षिण में प्रावट और वर्षा दो ऋतुये होती है। हिमालय पर्वत क्षेत्र में शीत (ठंड) अधिक होती है। इसलिए हेमन्त और शिशिर दो ऋतुये होती है। आयुर्वेद में यह शिद्धान्त है कि दोष का संचय जिस ऋतु में होता है, उससे अगली ऋतु में उसका प्रकोप होता है। तथा उससे उससे आगे की ऋतु में उसका प्राशय होता है। यदि शिशिर ऋतु को लेकर ऋतु माना जाय तो हेमंत में संचित कफ को शिशिर में कुपित होना चाहिए। पर यह प्रत्यक्ष में दिखाई देता है कि हेमंत का प्रकोप वंसन्त में ही होता है। इस पक्ष में शिशिर में किसी भी दोष का संचय एवं प्रकोप नही होता है। इसलिए आयुर्वेद के विद्ववानों ने प्रावृट ऋतु को लेकर 6 ऋतुओं को माना है। उनके अनुसार ग्रीष्म में बात का संचय, प्रावृट में प्रकोप और वर्षा में उपशम, कफ का हेमंत में संचय, वंसन्त में प्रकोप एवं ग्रीष्म में उपसम होना माना जाता है।

 

*जिस पक्ष में शिशिर वंसन्त ऋतु का जो वर्णन किया गया है, वह संक्रांति के अनुसार किया गया है। कुछ विद्वान गर्मी सर्दी वर्षा 3 ऋतु को ही मानते है। आयुर्वेद में दोष संचय के अनुसार 6 ऋतुये मानी जाती है।


ऋतु चर्चा भाग 3

आयुर्वेद सरल चिकित्सा*

आहार के नियम- भारतीय 12 महीनों अनुसार

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भारतीय  काल गणना के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से नव वर्ष का आरम्भ होता है ।

 

चैत्र ( मार्च-अप्रैल) इस महीने में गुड का सेवन करे क्योकि गुड आपके रक्त संचार और रक्त को शुद्ध करता है एवं कई बीमारियों से भी बचाता है। चैत्र के महीने में नित्य नीम की 45 कोमल पतियों का उपयोग भी करना चाहिए इससे आप इस महीने के सभी दोषों से बच सकते है। नीम की पतियों को चबाने से शरीर में स्थित दोष शरीर से हटते है।

 

वैशाख (अप्रैल मई)- वैशाख महीने में गर्मी की शुरुआत हो जाती है। बेल पत्र का इस्तेमाल इस महीने में अवश्य करना चाहिए जो आपको स्वस्थ रखेगा। वैशाख के महीने में तेल का उपयोग बिल्कुल न करे क्योकि इससे आपका शरीर अस्वस्थ हो सकता है।

 

ज्येष्ठ (मई-जून) भारत में इस महीने में सबसे अधिक गर्मी होती है। ज्येष्ठ के महीने में दोपहर में सोना स्वास्थ्य वर्द्धक होता है , ठंडी छाछ , लस्सी, ज्यूस और अधिक से अधिक पानी का सेवन करें। बासी खाना, गरिष्ठ भोजन एवं गर्म चीजो का सेवन न करे। इनके प्रयोग से आपका शरीर रोग ग्रस्त हो सकता है।

 

अषाढ़ (जून-जुलाई) आषाढ़ के महीने में आम , पुराने गेंहू, सत्तु , जौ, भात, खीर, ठन्डे पदार्थ , ककड़ी, पलवल, करेला, बथुआ आदि का उपयोग करे व आषाढ़ के महीने में भी गर्म प्रकृति की चीजों का प्रयोग करना आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

 

श्रावण (जूलाई-अगस्त) श्रावण के महीने में हरड का इस्तेमाल करना चाहिए। श्रावण में हरी सब्जियों का त्याग करे एव दूध का इस्तेमाल भी कम करे। भोजन की मात्रा भी कम ले पुराने चावल, पुराने गेंहू, खिचड़ी, दही एवं हलके सुपाच्य भोजन को अपनाएं।

 

भाद्रपद (अगस्त-सितम्बर) इस महीने में हलके सुपाच्य भोजन का इस्तेमाल कर  वर्षा का मौसम् होने के कारण आपकी जठराग्नि भी मंद होती है इसलिए भोजन सुपाच्य ग्रहण करे। इस महीने में चिता औषधि का सेवन करना चाहिए।

 

आश्विन (सितम्बर-अक्टूबर) दूध , घी, गुड़ , नारियल, मुन्नका, गोभी आदि का सेवन कर सकते है। ये गरिष्ठ भोजन है लेकिन फिर भी इस महीने में पच जाते है क्योकि इस महीने में हमारी जठराग्नि तेज होती है।

कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर) कार्तिक महीने में गरम दूध, गुड, घी, शक्कर, मुली आदि का उपयोग करे।  ठंडे पेय पदार्थो का प्रयोग छोड़ दे। छाछ, लस्सी, ठंडा दही, ठंडा फ्रूट ज्यूस आदि का सेवन न करें।


*ऋतु परिवर्तन*

*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*

* ऋतु परिवर्तन होने पर स्वास्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी ऋतुचर्या-का ही विषय है ऋ़तु परिवर्तन एवं स्वास्थ्य सावधानी*

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  *अभी तक हमने उत्तरायण एवं दक्षिणायन में आने वाली छह ऋतुओं में किसी व्यक्ति की जीवनचर्या क्या होनी चाहिए, क्या-क्या दोष संभावित हैं, ऋतु विशेष में वातावरण कैसा होता है- इन पर विचार किया। आयुर्वेद पूर्णतः विज्ञानसम्मत है एवं यह बताता है कि शास्त्रोक्त जीवनपद्धति का पालन किया जाए तो किसी प्रकार के रोगों की संभावना नहीं रहती। अभी ऋतु विशेष के अनुसार आहार की हमने विशेष चर्चा नहीं की है। हाँ, ऋतुसंधि एवं ऋतु हरीतकी पर संक्षिप्त टिप्पणी पिछली बार की है। अब मौसम विशेष के अनुसार त्रिदोषों की स्थिति क्या होती है, इस पर इस समापन किस्त में प्रकाश डालेंगे। पंचकर्म प्रकरण की विस्तार से सद्वृत्त के साथ चर्चा बाद में होगी। वातावरण में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव भिन्न-भिन्न ऋतुओं में होते हैं। आहार भी बदलता रहता है। यही दोषों को प्रभावित करता है। आहार तो हम अपने आप नियंत्रित कर सकते हैं, उपवास आदि से शोधन भी कर सकते हैं,

      * परंतु जो वातावरण के घटक हैं वे सीधे हमारी त्वचा, श्वसन संस्थान, रक्तवाही संस्थान पर प्रभाव डालकर सारे शरीर को प्रभावित करते हैं।

वातावरण का वात पर प्रभाव- तीन प्रकार के प्रभाव वात नामक दोष पर पड़ते हैं और यही बीमारी के हेतु बन जाते हैं। ये हैं वात क्षय, वात प्रकोप एवं वात प्रशमन। क्षय अर्थात एकत्र हो जाना, प्रकोप अर्थात बढ़ जाना एवं प्रशमन अर्थात घट जाना।

    *  वात क्षय- ग्रीष्म ऋतु में जब शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है एवं पाचन क्षमता भी कम हो जाती है, मनुष्य पसीने से भी पानी को गँवाता है एवं शरीर से एक प्रकार से जलतत्त्व (फ्ल्युड एवं इलेक्ट्रोलाइट्स) कम होता चला जाता है। इससे वात एकत्र होता चला जाता है। भोजन में शुष्कता एवं हलकापन भी वात क्षय बढ़ाते हैं, पंरतु ग्रीष्म के प्रभाव से यह इतना अधिक नहीं होता कि वात प्रकुपित हो जाए।

       *वात प्रकोप- वर्षा ऋतु में पाचनशक्ति एवं सामान्य शक्ति और अधिक कम हो जाती है। गरमी से ठंढक में अचानक परिवर्तन एक ही दिन में कई बार होता है इससे वात एकत्र होकर प्रकोप की दिशा में चला जाता है। आयुर्वेद के निष्णात विद्वान इस तथ्य से परिचित हो उपचार करते हैं।

    * वात प्रशमन- शरद ऋतु में आद्र्रता एवं गरमी का प्रभाव वातावरण में अधिक होता है। इसलिए शरदकाल में बढ़ा हुआ वात स्वतः घट जाता है एवं सात्मीकरण (होमियोस्टेसिस) की स्थिति आ जाती है।

वातावरण का पित्त पर प्रभाव- पित्त पर भी पित्त क्षय, पित्त प्रकोप एवं पित्त प्रशमन नामक तीन प्रभाव पड़ते है। ये अलग-अलग ऋतु में अलग-अलग प्रभाव डालते हैं इसीलिए आहार, औपधि, जीवनचर्या अलग-अलग रखनी होती है। 

     * पित्त क्षय-ग्रीष्म का आतप शरीर मे गरमी का अनुपात बढ़ाकर इसे थका देता है। शरीर की शक्ति एवं पाचनशक्ति वर्षा के आगमन के साथ और भी कम हो जाती है। पानी की शुद्धता भी बरसाती जल के कारण संदिग्ध हो जाती है। स्वाद में परिवर्तन एवं अपच के कारण पित्त एकत्र होने लगता है एवं यह स्थिति पूरे वर्षाकाल व ग्रीष्म की पराकाष्ठा के काल में बनी रहती है। यदि वातावरण में ठंढक रहे तो पित्त क्षय नहीं होता।

पित्त प्रकोप- यह स्थिति शरदकाल में आती है, जब वर्षा के तुरंत बाद गरमी का प्रभाव तीव्रतम स्थिति में कुछ समय के लिए आता है। इससे एकत्र पित्त प्रकुपित हो उठता है एवं कभी-कभी उसका प्रभाव अधिक भी दिखाई देने लगता है।

   * पित्त प्रशमन- हेमंत के आगमन के साथ ही वातावरण में भी मधुरता एवं भोज्य पदार्थों में मधुर रस का बाहुल्य, ऋतु की ठंढक के साथ पित्त को शांत कर देता है।

*वातावरण का कफ पर प्रभाव-त्रिदोषों में कफ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इससे क्राॅनिक रोग जन्म लेते हैं, यदि ऋतु अनुसार कफ क्षय, प्रकोप एवं प्रशमन का ध्यान न रखा जाए।

   * कफ क्षय- हेमंत में स्वाभावतः भूख अधिक लगती है, शरीर में ताकत भी होती है। खाने-पीने की आदतें बदल जाती हैं और शिशिर ऋतु (जाती हुई ठंढक) तक जारी रहती हैं। उस समय पाचनशक्ति, कम होने लगती है। वातावरण की ठंढक एवं न्यून पाचनशक्ति, परंतु आहार अधिक होने से कफ क्षय होने लगता है, अर्थात कफ एकत्र हो जाता है।

    * कफ प्रकोप- वसंत का आगमन संचित कफ को पिघला देता है और नतीजा निकलता है, प्रकुपित कफ व उससे पैदा हुए रोगों के रूप में।

कफ प्रशमन- गरमी के आगमन के साथ ही संचित, प्रकुपित कफ स्वतः शांत हो जाता है। यहाँ यह कहना जरूरी है कि ऋषियों की यह सब प्रतिपादित     

  *  हाइपोथीसिस-परिकल्पनाएँ भोगे हुए यथार्थ है एवं तब के हैं, जब न हीटर, एयरड्रापर, एयर कंडीशनर्स आदि होते थे। आज ये हैं तो दोष और ज्यादा हैं, क्योंकि कुसमय का ऋतु परिवर्तन दिन में कई-कई बार होता है एवं जीवनशैली में खान-पान की विकृतियाँ जुड़ गई हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि ये त्रिदोष शरीर को अधिक प्रभावित करेंगे और रोगी बनाएँगे। जीवनशैली के रोग (लाइफ स्टाइल disorder) इसीलिए आज ज्यादा हैं।

दोष शोधनम्- पंचकर्मों द्वारा शरीर का त्रिदोषों से शोधन किया जा सकता है। कफ दोष को वसंत ऋतु में वमन द्वारा, पित्त दोष को छोटी आँतों से शरद ऋतु में विरेचन द्वारा तथा वात दोष को बड़ी आँतों से स्थापन वस्ति द्वारा वर्षा ऋतु में संपन्न कर मिटाया जा सकता है। ये पंचकर्म प्रकोप की स्थिति में ही करना ठीक रहते हैं, परंतु ये एकत्र न होने पाएँ ऐसी सावधानी रखी जाए। इसके लिए जिस ऋतु में इनका प्रकोप होता है या होने की संभावना रहती है, उसके प्रारंभ में ही पंचकर्म कर लिए जाएँ तो प्रकोप की संभावना नहीं होती। शोधन तब नहीं करना चाहिए, जब ऋतु अपनी पूर्ण परिपक्वावस्था में होती है एवं शरीर भी कमजोर होता है।

          *  हेमंत व शिशिर ऋतु में उचित है कि तैल मालिश (स्नेहन) नियमित रूप से की जाए एवं इसके लिए वातहर औषधियों का तैल (बलादि तैंल, नारायण तैल) का प्रयोग किया जाए। वसंत ऋतु में नीम तैल, सरसों तैल या शीशम तैल से गरम मालिश की जाए। साथ ही गरम रेत के थैलों द्वारा स्वेदन भी किया जाए। वमन एवं नस्य भी किया जा सकता है। ग्रीष्म ऋतु में वातहर-पित्तहर स्नेहन घी की मालिश से करना चाहिए। वर्षा ऋतु में स्नेहन एवं विरेचन की ही अनुमति है। शारद ऋतु में औषधियुक्त घी (तिक्त घी) से स्नेहन किया जाए, हलका स्वेदन तथा कुटकी, हरीतकी, शुंठी, आमलकी द्वारा विरेचन किया जाए। ये उपाय परीक्षित हैं, सिद्ध हैं एवं किसी भी रोग से व्यक्ति को बचाने में सक्षम हैं। हम यह फिर बता दें कि यहाँ पंचकर्म की संक्षिप्त चर्चा ही ऋतुचर्या के संदर्भ में कही गई है।

  * ऋतु विपर्यय- आज ग्लोबल वार्मिग के कारण, हमारी जीवनचर्या बदल जाने के कारण ऋतुओं में वे प्रभाव नहीं हैं, जो उनके स्वाभाविक गुण हुआ करते थे। मई में ओले गिरना, बहुत ज्यादा ठंढक एवं शिशिर, शरद में गरम मौसम बहुतायत से देखने को मिल रहा है। यह बदला ऋतु का मिजाज ही रोगों को जन्म देता है, शरीर की जीवनीशक्ति की जमकर परीक्षा लेता है। इसका प्रभाव कृषि, पर्यावरण, उत्पन्न होने वाली शाक-सब्जियों, फलादि पर भी होता है तथा ग्रहण किए जाने पर ये भी गलत प्रभाव डालते हैं। इस पर आयुर्वेद के मनिशीयो ऋषियों ने संकेत मात्र किया था परन्तु आज इसी विषय पर पूरी दुनिया का स्वास्थ्य विज्ञान रोज नये प्रयोग कर रहा है  , आज यही सर्वाधिक चर्चित विषय बन गया है।

   यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 

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