*गरम पानी पीना है स्वास्थ्य के लिए है लाभ कारी।
*-------------------------*
हम सभी
को अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए रोजाना 8 से 10 गिलास पानी अवश्य पीना चाहिए।
लेकिन अगर आप ठंडा पानी की बजाय गर्म पानी का सेवन करेंगे। तो यह आपके शरीर के लिए
और भी ज्यादा फायदेमंद होता है। इसलिए आज हम आपको बताने वाला हैं औरकि जो लोग हमेशा गर्म पानी का सेवन
करते हैं। उन्हें शारीरिक रूप से 9 बड़े फायदे होते हैं।
1. सबसे पहले तो बदलते मौसम में होने वाली
सर्दी जुकाम की परेशानी से बचने के लिए गर्म पानी का सेवन करें।
2. गर्म पानी पीते रहने से ब्लड सरकुलेशन बेहतर
रहता है। जिससे दिल की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। साथ ही पाचन तंत्र भी
मजबूत होता है।
3. चेहरे की त्वचा से संबंधी किसी भी परेशानी
या दाग धब्बे होने पर गर्म पानी का सेवन बहुत फायदेमंद होता है। यह त्वचा को बेदाग
और खूबसूरत बनाता है।
4. भूख ना लगने पर एक गिलास गर्म पानी में काली
मिर्च, नमक और नींबू का रस मिलाकर पीना चाहिए, इससे भूख
खुलकर लगने लगती है।
5. गर्म पानी का सेवन करने से पाचन बेहतर रहता
है। और यह गैस, एसिडिटी, कब्ज और
पेट की तमाम परेशानियों से छुटकारा दिलाता है।
6. बढ़ते हुए वजन को कम करने के लिए गर्म पानी
में नींबू और शहद डालकर सुबह खाली पेट सेवन करें, साथ ही
खाना खाने के आधे घंटे बाद आधा गिलास गर्म पानी पियें, इससे
तेजी से फैट बर्न होता है।
7. शरीर में टॉक्सिंस जमा होने से झुर्रियां
पड़ने लगती हैं। और व्यक्ति कम उम्र में ही बूढा लगने लगता है। गर्म पानी पीते
रहने से शरीर से टॉक्सिंस बाहर निकाल देता है।जिससे आप लम्बे समय तक जवान नजर आते
हैं।
8. हमेशा गर्म पानी पीते रहने से हड्डियों और
जोड़ों का दर्द दूर रहता है। यह मांसपेशियों की ऐंठन को भी दूर करता है।
9. गर्म पानी के पीते रहने से बालों को भरपूर
पोषण मिलता है। जिससे बाल लम्बे, काले और
चमकदार
होते हैं।
गरम पानी से हमारा अभिप्राय ऐसे गरम से नहीं है
जिसे चाय की तरह फूंक मार कर पीया जाये मेरा तात्पर्य गरम पानी से है 50/फारेनहाइट
से आपके शरीर के तापमान ( टेम्परेचर) के बराबर हो यानी 98.5/0फारेनहाईट शरीर के तापमान से आधे से भी कम पानी पीने से
है ज्यादा ठंडा पानी पीने सेपाचनतंत्र ठीक से काम नहीं करता विषेश रूप से 40,
वर्ष की आयु के बाद25/0, सेंटीग्रेट से
37/0, सेंटीग्रेट तक गरम होइससे अधिक गरम पानी रोग रोधी छमता को कम करता है
विषेश परिस्थितियों में सर्द मौसम में या कुछ आयुर्वेदिक दवाओं के साथ अथवा
चिकित्सक यदि कहें तभी 37/0, सेंटीग्रेट से अधिक गरम पानी पीयें।
*खाने के बाद पानी नहीं*
*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
*खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए ऐसा
कहना है आयुर्वेद के विद्वानों का मत है
*-------------------------*
आयुर्वेद कहता है भोजन से पहले पानी पीना अमृत
तथा भोजन के साथ पानी पीना आनन्द और भोजन के तुरंत बाद पानी पीना विष के समान है
पानी पीने का सही समय जानिए और स्वस्थ रहिए।
हम भोजन में जो भी खाते हैं
दूध,दही छाझ लस्सी
फल आदि|,
ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण किया ये
सब कुछ हमको उर्जा देता है और आंत्र उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है | पेट
मे एक छोटा सा स्थान होता है जिसको हम हिंदी मे कहते है "अमाशय" उसी
स्थान का संस्कृत नाम है "जठर"| उसी स्थान को
अंग्रेजी मे कहते है "epigastrium "|
ये एक थैली की तरह होता है और यह जठर हमारे
शरीर मे सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है।ये बहुत
छोटा सा स्थान हैं इसमें अधिक से अधिक 350 , ग्राम से
2 किलो खाना आ सकता है यह व्यक्ति के
स्वास्थ्य उसकी डाइट शारीरिक बनावट पर निर्भर करता है | हम कुछ
भी खाते सब ये अमाशय मे आ जाता है|
आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है उसी को कहते
हे"जठराग्न"।ये जठराग्नि है वो अमाशय मे प्रदीप्त होने वाली आग है ।
ऐसे ही
पेट मे होता है जेसे ही आपने खाना खाया की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी |यह
शरीर की स्वेच्छिक ग्रन्थियों का स्वचलित मेमेकेनिजम है ऑटोमेटिक है,जेसे
ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई| ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना
पचता है |
अब अपने खाते ही गटागट पानी पी लिया और खूब
ठंडा पानी पी लिया|
और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है |अब
जो आग (जठराग्नि) जल रही थी वो बुझ गयी| आग अगर बुझ गयी
तो खाने की पचने की जो क्रिया है वो रुक गयी|
हमेशा
याद रखें खाना जाने पर हमारे पेट में दो ही क्रिया होती है,
एक क्रिया है जिसको हम कहते हे "Digestion" और दूसरी है "fermentation"फर्मेंटेशन
का मतलब है सडना और डायजेशन का मतलब हे पचना|
आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी तो खाना पचेगा,खाना
पकेगा(पचेगा) तो उससे रस बनेगा|
जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस, मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र
और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा|
ये तभी होगा जब खाना पचेगा|
यह सब हमें चाहिए|
ये तो
हुई खाना पचने की बात अब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा..?
खाने के सड़ने पर सबसे पहला जहर जो बनता है वो
हे यूरिक एसिड (uric acid )
|कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है की मुझे
घुटने मे दर्द हो रहा है, मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है तो
डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है आप ये दवा खाओ, वो दवा
खाओ यूरिक एसिड कम करो|
और एक दूसरा उदाहरण खाना
जब खाना सड़ता है, तो यूरिक
एसिड जेसा ही एक दूसरा विष बनता है जिसको हम कहते हे
LDL (Low Density lipoprotive) माने
खराब कोलेस्ट्रोल (cholesterol )|
जब आप ब्लड प्रेशर(BP) चेक कराने
डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो आपको कहता है (HIGH BP )
हाई-बीपी है आप पूछोगे कारण बताओ?
तो वो
कहेगा कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है |
आप ज्यादा पूछोगे की कोलेस्ट्रोल कौनसा बहुत है
?
तो वो
आपको कहेगा LDL बहुत है |
इससे भी ज्यादा खतरनाक एक विष हे
वो है VLDL(Very Low Density lipoprotive)|
ये भी कोलेस्ट्रॉल जेसा ही विष है।
अगर VLDL बहुत बढ़
गया तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता|
खाना सड़ने पर और जो जहर बनते है उसमे एक ओर
विष है जिसकोअंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides|
जब भी डॉक्टर आपको कहे की आपका "triglycerides"
बढ़ा हुआ हे तो समज लीजिए की आपके शरीर मे विष निर्माण हो रहा है |
तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,कोई
कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे, कोई LDL -VLDL के नाम
से कहे समझ लीजिए की ये विष हे और ऐसे विष 103 है |
ये सभी विष तब बनते है जब खाना सड़ता है |
मतलब समझ लीजिए किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ
है तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए की खाना पच नहीं रहा है ,
कोई कहता हे मेरा triglycerides बहुत
बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप ! की आपका खाना पच नहीं रहा
है |
कोई कहता है मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो एक
ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे की खाना पच नहीं रहा है |
क्योंकि खाना पचने पर इनमे से कोई भी जहर नहीं
बनता|
खाना पचने पर जो बनता है वो है मांस,मज्जा,रक्त
,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र,अस्थि
और खाना नहीं पचने पर बनता है यूरिक एसिड, कोलेस्ट्रोल
,LDL-VLDL|
और यही आपके शरीर को रोगों का घर बनाते है !
पेट मे
बनने वाला यही जहर जब
ज्यादा
बढ़कर खून मे आते है ! तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता और रोज थोड़ा
थोड़ा कचरा जो खून मे आया है इकट्ठा होता रहता है और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता
है
*जिसे आप heart attack कहते हैं
!
तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है की
जो हम खा रहे हे वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए और खाना ठीक से पचना चाहिए इसके लिए
पेट मे ठीक से आग (जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए|
क्योंकि बिना आग के खाना पचता नहीं हे और खाना
पकता भी नहीं है
महत्व की बात खाने को खाना नहीं खाने को पचाना
है |
आपने क्या खाया कितना खाया वो महत्व नहीं हे।
खाना अच्छे से पचे इसके लिए वाग्भट्ट जी ने
सूत्र दिया !!
*"भोजनान्ते विषं वारी"*
(मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर
पीने के बराबर
है )
*इसलिए खाने के तुरंत बाद पानी कभी मत पिये!*
अब आपके मन मे सवाल आएगा कितनी देर तक नहीं
पीना ??? तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना अब आप कहेंगे इसका क्या calculation
हैं ??
बात ऐसी है !जब हम खाना खाते हैं तो जठराग्नि
द्वारा सब एक दूसरे मे मिक्स होता है और फिर खाना पेस्ट मे बदलता हैं है !
पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक 1 घंटा 48
मिनट का समय लगता है !
उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है ! (बुझती तो
नहीं लेकिन बहुत
धीमी हो जाती है ) पेस्ट बनने के बाद शरीर मे
रस बनने की परिक्रिया शुरू होती है !तब हमारे शरीर को पानी की जरूरत होती हैं ।तब
आप जितना इच्छा हो उतना पानी पिये !! जो बहुत मेहनती लोग है (खेत मे हल चलाने वाले
, रिक्शा खीचने वाले पत्थर तोड़ने वाले) उनको 1 घंटे के बाद ही रस बनने
लगता है उनको घंटे बाद पानी पीना चाहिए !
अब आप कहेंगे खाना खाने के पहले कितने मिनट तक
पानी पी सकते हैं ??? तो खाना खाने के 30 मिनट पहले तक आप पानी पी
सकते हैं !
अब आप पूछेंगे ये मिनट का calculation
????
बात ऐसी ही जब हम पानी पीते हैं
तो वो शरीर के प्रत्येक अंग तक जाता है !और अगर
बच जाये तो 45 मिनट बाद मूत्र पिंड तक पहुंचता है ! तो पानी - पीने से मूत्र पिंड
तक आने का समय 45 मिनट का है !
तो आप खाना खाने 30से 45 मिनट पहले ही पानी
पिये या खाने के बीच बीच में पानी पीना चाहिए पानी अधिक ठंडा न हो फ्रिज का पानी
खाने के साथ न पीएं पानी पीने के नियम पालन करे और स्वस्थ रहें !
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
25/10/2024, 7:48 am
- Yashpal S Barampur: (७२)
*खाली पेट गुनगुना पानी पीने के फायदे**
आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
*-------------------------------------*
*1 विषैले तत्व करे बाहर -*
भरपूर मात्रा में पानी पीने से, शरीर
में मौजूद हानिकारक एवं विषैले तत्व पसीने व मूत्र द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते
हैं। जिससे विषाणुओं से बचाव होता है, बीमारियां नहीं
होती। सुबह के वक्त खाली पेट पानी पीने से शरीर की बेहतर सफाई होती है।
*2 पेट संबंधी समस्या -*
सुबह उठकर खाली पेट पानी पीने से पेट की सारी
समस्याएं खत्म हो जाती हैं।इससे कब्ज में राहत मिलती है, आंतों
में जमा मल निकलने में आसानी होती है, जिससे पेट पूरी
तरह से साफ होता है और भूख भी खुलती है।
*3 तनाव से राहत -*
सुबह खाली पेट एवं दिनभर पानी पीते रहने से
तनाव नहीं होता, और मानसिक समस्याएं भी ठीक हो जाती हैं। जब आप
सोकर उठते हैं, तो दिमाग शांत होता है। ऐसे समय पानी पीना
दिमाग को ऑक्सीजन प्रदान कर, उसे तरोजाता बनाए रखता है, जिससे
दिमाग सक्रिय रहता है।
*4 वजन कम करे-*
सुबह के वक्त एकदम ठंडा पानी पीने से आपका
मेटाबॉलिज्म 24 प्रतिशत तक बढ़ता है, जिससे वजन आसानी से कम होता है,
वहीं गरम पानी पीने से भी अतिरिक्त चर्बी कम होती है, और
आपका वजन कम हो जाता है।
*5 पेशाब संबंधी समस्याएं -*
सुबह खाली पेट पिया जाने वाला पानी, रातभर
शरीर में बने हानिकारक तत्वों को एक ही बार में पेशाब के जरिए निकालने का काम करता
है, इसके साथ ही समय-समय पर भरपूर मात्र में पानी पीते रहने पर, पेशाब
में जलन, यूरिन इंफेक्शन एवं अन्य समस्याएं समाप्त हो जाती है।
*6 त्वचा बने स्वस्थ-*
खाली पेट पानी पीने से कोशिकाओं को ऑक्सीजन
मिलती है, और वे सक्रिय रहती हैं, जिससे त्वचा पर ताजगी बनी रहती है।
इसके साथ ही पसीने द्वारा हानिकारक तत्व शरीर से बाहर निकलने पर, त्वचा
अंदर से साफ होती है और उसमें नमी बनी रहती है, जिससे
त्वचा स्वस्थ व चमकदार दिखाई देती है।
*7 शरीर का तापमान -*
खाली पेट पानी पीने से दिन की शुरूआत से ही
आपके शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है, जिससे छोटी-
छोटी बीमारियों से शरीर सुरक्षित रहता है।
*8 रोग
प्रतिरोधक क्षमता -*
पानी शरीर में अवांछित तत्वों को रहने नहीं
देता, और शरीर के सभी अंगों को स्वस्थ बनाए रखता है। इससे शरीर की रोग
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
*9 नई कोशिका -*
पानी रक्त में हानिकारक तत्वों को घुलने नहीं
देता, और उसके शुद्धिकरण में सहायक होता है, जिससे नई
कोशिकाओं और मांसपेशियों के बनने की प्रक्रिया बढ़ जाती है ।
*10
नमी बनाए रखे -*
सुगमता से कार्य करने के लिए शरीर के अंगों में
नमी को होना बेहद आवश्यक है, जिसे बनाए रखने का कार्य पानी करता है।
इसलिए दिन की शुरूआत में ही खाली पेट पानी पीना बेहतर होता है, ताकि
पूरा दिन शरीर के सभी अंग सुगमता से कार्य कर सकें ।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
26/10/2024, 8:25 am
- Yashpal S Barampur: This message was deleted
26/10/2024, 2:53 pm
- Yashpal S Barampur: *(७३)
*अमृत है घड़े का पानी*
*आयुर्वेद सरल चिकित्सा**
*---------------------*
*पानी के लिए जब घड़े थे।
हम
बीमारी से दूर खड़े थे।।
आज हमारे पास आरो है।
और बिमारी भी हजारों है
*1:- मिट्टी में कई प्रकार के रोगों से लड़ने
की क्षमता पाई जाती है।*
विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी के बर्तनों में
पानी रखा जाए, तो उसमें मिट्टी के गुण आ जाते हैं। इसलिए घड़े
में रखा पानी हमें स्वस्थ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
*2:-चयापचय को बढ़ावा*
नियमित रूप से घड़े का पानी पीने से प्रतिरक्षा
प्रणाली को बढ़ावा देने में मदद मिलती है। प्लास्टिक की बोतलों में पानी स्टोर
करने से,या Ro के पानी में माइक्रो प्लास्टिक कण घुल जाते हैं
जो स्वास्थ्य के लिए हानी कारक हैं कैंसर का कर्क हैं उसमें प्लास्टिक से
अशुद्धियां इकट्ठी हो जाती है और वह पानी को अशुद्ध कर देता है। यदि आप के यहां
पानी में अधिक अशुद्धि है तब आप बेहतर तो यह है आप Roसे फिल्टर किया पानी मिट्टी के घड़े में स्टोर
करलें तभी प्रयोग करें मिट्टी का घड़ा माइक्रो प्लास्टिक को सोख लेता है और उपयोगी
तत्व पानी में मिला देता है साथ ही यह भी पाया गया है कि घड़े में पानी स्टोर
करने से शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ जाता है।
*3:-पानी में पीएच का संतुलन*
घड़े का पानी पीने का एक और लाभ यह भी है कि
इसमें मिट्टी में क्षारीय गुण विद्यमान होते है। क्षारीय पानी की अम्लता के साथ
प्रभावित होकर, उचित पीएच संतुलन प्रदान करता है। इस पानी को
पीने से एसिडिटी पर अंकुश लगाने और पेट के दर्द से राहत प्रदान पाने में मदद मिलती
हैं।
*4:-गले को ठीक रखे*
आमतौर पर हमें गर्मियों में ठंडा पानी पीने की
तलब होती है और हम फिज्र से ठंडा पानी ले कर पीते हैं। ठंडा पानी हम पी तो लेते
हैं लेकिन बहुत ज्यादा ठंडा होने के कारण यह गले और शरीर के अंगों को एक दम से
ठंडा कर शरीर पर बहुत बुरा प्रभावित करता है। गले की कोशिकाओं का ताप अचानक गिर
जाता है जिस कारण व्याधियां उत्पन्न होती है। गले का पकने और ग्रंथियों में सूजन
आने लगती है और शुरू होता है शरीर की क्रियाओं का बिगड़ना। जबकि घडें को पानी गले
पर सूदिंग प्रभाव देता है।
*5:-गर्भवती महिलाओं के लिए फायदेमंद*
गर्भवती को फ्रिज में रखे, बेहद
ठंडे पानी को पीने की सलाह नहीं दी जाती। उनसे कहा जाता है कि वे घड़े या सुराही
का पानी पिएं। इनमें रखा पानी न सिर्फ उनकी सेहत के लिए अच्छा होता है, बल्कि
पानी में मिट्टी का सौंधापन बस जाने के कारण गर्भवती को बहुत अच्छा लगता है।
*6:-वात को नियंत्रित करे*
गर्मियों में लोग फ्रिज का या बर्फ का पानी
पीते है, इसकी तासीर गर्म होती है। यह वात भी बढाता है। बर्फीला पानी पीने से
कब्ज हो जाती है तथा अक्सर गला खराब हो जाता है। मटके का पानी बहुत अधिक ठंडा ना
होने से वात नहीं बढाता, इसका पानी संतुष्टि देता है। मटके को
रंगने के लिए गेरू का इस्तेमाल होता है जो गर्मी में शीतलता प्रदान करता है। मटके
के पानी से कब्ज ,गला ख़राब होना आदि रोग नहीं होते।
*7:-विषैले पदार्थ सोखने की शक्ति*
मिटटी में शुद्धि करने का गुण होता है यह सभी
विषैले पदार्थ सोख लेती है तथा पानी में सभी जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व मिलाती है।
इसमें पानी सही तापमान पर रहता है, ना बहुत अधिक ठंडा ना गर्म।
*8:-कैसे ठंडा रहता है पानी*
मिट्टी के बने मटके में सूक्ष्म छिद्र होते
हैं। ये छिद्र इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा
सकता।और सुराही तो बनाईं ही पानी को ठंडा करने के लीये जाती थीं जिसे 40_50,
वर्ष पहले जब रेफ्रिजरेटर
नहीं था या ये कहें आम आदमी की पहुंच में नहीं था पानी को ठंडा करने के लिए मिट्टी
से बनी सुराही का प्रयोग किया जाता था पूरे उत्तर भारत में मिट्टी से सुराही बनाने का काम उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के
नजीबाबाद में होता था और यहां की बनी सुराही राष्ट्रपति भवन तक जाती थी नजीबाबाद
निवासी रामप्रसाद प्रजापति को उत्कृष्ट सुराही बनाने के लिए 1952मे भारत के
तत्कालीन राष्ट्रपति, डा०राजेन्द्रप्रसाद द्वारा राष्ट्र पति भवन में
सम्मानित भी किया गया था पानी का ठंडा होना वाष्पीकरण की क्रिया पर निर्भर करता
है। जितना ज्यादा वाष्पीकरण होगा, उतना ही ज्यादा पानी भी ठंडा होगा। इन
सूक्ष्म छिद्रों द्वारा मटके का पानी बाहर निकलता रहता है। गर्मी के कारण पानी
वाष्प बन कर उड़ जाता है। वाष्प बनने के लिए गर्मी यह मटके के पानी से लेता है। इस
पूरी प्रक्रिया में मटके का तापमान कम हो जाता है और पानी ठंडा रहता l
*पानी की गुणवत्ता बनाते रखने के लिए 20से25दिन बाद नया घड़ा बदल ते रहें
घड़े को कभी भी सरफ या साबुन या किसी भी रासान से ना धुले हाथ की सहायता से साफ
सादे पानी से ही धुलें
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
27/10/2024, 8:25 am
- Yashpal S Barampur: *(७४)
ताम्बे के बर्तन में पानी पीने के फायदे*
आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
*-------------------------*
*तांबा का प्रयोग पानी पीने के बर्तन बनाने में
किया जाता रहा है. अगर तांबे के बरतन में रखा पानी कुछ अशुद्ध है तो यह कुछ ही
घंटो में पानी के साथ प्रतिक्रिया करके शुद्ध हो जाता है.
*आजकल किसी भी घर की रसोई में देखें तो
ज्यादातर बर्तन Stainless steel, कुछेक एल्युमीनियम, कांच,
चीनी मिटटी के होंगे. याद करें पहले गांवों और शहरों में भी बहुत तरह
के धातु से बने बर्तनों का उपयोग किया जाता था जैसे लोहा, कांसा,
पीतल, तांबा, लकड़ी, चाँदी
आदि.
*तांबे के बर्तन में पानी क्यों पियें*
*यह हमारे पाचन तंत्र को सुधारता है.
*वजन कम करने में सहायक है.
*घावों को जल्दी भरता है.
*बुढ़ापे की दर को कम करता है.
*हमारे हृदय तंत्र को पुष्ट करता है और
हाइपरटेंशन में लाभदायक है.
*कैंसर का प्रतिरोधक है.
*बैक्टीरिया को मारता है.
*दिमाग को स्टीमुलेट करता है.
*थायराइड को नियंत्रित करता है.
*संधिवात
और जोड़ों की सूजन कम करता है.
*खून की कमी दूर करता है.
*कोलेस्ट्रोल कम करता है.
*लीवर, स्प्लीन और लिंफ
सिस्टम के लिए टॉनिक का काम करता है.
*मैलेनिन
की रक्षा करता है.
*शरीर को लौह तत्व एब्सॉर्ब करने में सहायक है.
*किडनियों को साफ करता है.
*बालो की हर प्रकार की समस्या को दूर है.
*नियमित उषाकाल में इस पात्र के रखे जल को पीने
से कब्जियत दूर होता है.
*तांबे के बर्तन का प्रयोग*
*यह बात सही है कि पौराणिक काल में हमारे देश पहले मिट्टी के बर्तन इस के बाद यदि मानव
विकास के क्रम में किसी धातु की खोज की वह तांबा था किसी धातु के प्रयोग किया उस जमाने में विद्वानों,
विचारकों के साथ ही साथ कई वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता भी थे जो अपने
प्रयोगों से प्रकृति के रहस्यों को उजागर करने का प्रयास करते रहते थे.
*बर्तनों को उनके कार्य और उपयोग के हिसाब से
अलग अलग धातुओं से बनाया जाता था क्योकि इनसे में कुछ धातुओं के बर्तन उनमे रखे
जाने वाले भोज्य पदार्थ से रासायनिक प्रतिक्रिया करने लगते थे.
*अतः इस बात का ध्यान रखा जाता था कि बर्तनों
को धातु के गुण के अनुसार सही उपयोग में ही लाया जाये.
*तांबा के बर्तन में रखा पानी रासायनिक प्रतिक्रिया करके
जीवाणुनाशक बन जाता है. यह ताम्बे का पानी स्वास्थ्य के अत्यंत लाभकारी होता है.
यह पानी रक्त को शुद्ध करता है, पाचन तंत्र सुदृढ़ करता है.
*तांबे के बर्तन में रखे पानी में जीवाणुरोधी,
एंटीऑक्सीडेट , कैंसररोधी और एंटीइन्फ्लेमेटरी गुण आ जाते हैं.
*वर्ष 2012 में हुई एक स्टडी में पता चला था कि
सामान्य तापमान पर तांबे के बर्तन में 16 घंटे तक रखने पर दूषित पानी में मौजूद
हानिकारक जीवाणुओं की संख्या में कमी आ गई थी.
*वैज्ञानिको ने प्रयोग के तौर पर ऐसे पानी को
लिया कि जिसमे पेट के पेचिश रोग को पैदा करने वाले वायरस, अमीबा
ई-कोली थे. कुछ घंटो के पर्यवेक्षण के बाद वैज्ञानिको ने देखा कि हानिकारक
बैक्टीरिया पूरी तरह से समाप्त हो चुके थे.
*भारत में तो लोग सदियों से इस बात को जानते
हैं कि तांबे के बर्तन में रखे पानी में औषधीय गुण आ जाते हैं.
*एक रिसर्च में यह पता चला कि अस्पतालों में
तांबे की सतहों की मौजूदगी से ICU में पाए जानेवाले 97 प्रतिशत
बैक्टीरिया नष्ट हो गए, जिनसे होनेवाले इन्फेक्शंस में 40 प्रतिशत की
कमी आई.
*इन्ही खूबियों को जानकर पहले समय के लोग तांबे
के पात्र पानी रखने और पीने के काम लेते थे.
*तांबे के पात्र में रात भर या कम से कम चार
घंटे तक रखे गए पानी में तांबा धातु के वे गुण व्याप्त हो जाते हैं जिनसे शरीर,
विशेषकर हमारे लीवरको बहुत लाभ पहुंचता है. यह शरीर को स्वस्थ और
ऊर्जावान रखता है.
*हमें ऐसे लगता है कि बड़े बड़े अमीर लोग,
हीरो-हिरोइन वगैरह किसी दूसरी दुनिया के बने खान-पान का प्रयोग करते
हैं , ऐसा बिलकुल भी नहीं है.एक इंटरव्यू में करीना कपूर, मलाइका
अरोरा ने बताया कि सुबह उठने पर सबसे पहले वो रात भर तांबे के जग में रखा हुआ
पानी पीते है.
*ताम्बे के बर्तन कैसे साफ़ करे*
*जिस तांबे के बर्तन से आप पानी पीते हैं वह
बर्तन एक दो दिन में धुलना अवश्य चाहिए. इसका कारण यह है कि तांबा पानी के साथ
प्रतिक्रिया करके कॉपर ऑक्साइड बना देता है जोकि जंग जैसा बर्तन की दीवारों पर जम
जाता है. इसे साफ करना आवश्यक है अन्यथा यह पानी तांबा धातु के लाभदायक फायदे नहीं
दे पायेगा. व तांबे के पात्र से पानी पीते वक्त नंगे पांव न रहें व इस पात्र के
रखे जल को कभी भी गर्म करके नहीं पीना चाहिए
*बरसात के मौसम में हर इंसान को पूरे दिन इसी
पात्र का रखा जल ही सेवन करना चाहिये व अन्य मौसम में उषाकाल में मात्र व किसी
कॉपर की कमी से उतपन्न रोग से ग्रसित हो तो कभी भी
*तांबे के बरतन साफ करने का आसान उपाय है.
नींबू, खटाई, केचप या नमक और सफ़ेद सिरका से ताम्बे के बर्तन
रगड़ें और दाग छुड़ा लें. इसके बाद किसी डिटरजेंट से धुल दें. बर्तन एकदम नए चमकने
लगेंगे.
*आजकल तांबे के बने बर्तनों के प्रयोग बस तांबे
के छोटे से लोटे के रूप में होता है, जिसे घर-मंदिर में पूजा पाठ और सूर्य
को अर्घ्य देने में प्रयोग किया जाता है.
*एक समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने
पूर्वजो की इस परम्परा का पालन करे/न करे पर कम से कम तांबे के फायदे जानकर ही सही
तांबे के बरतनों का प्रयोग पानी पीने में करें.
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
28/10/2024, 7:35 am
- Yashpal S Barampur: (७५)
*जल चिकित्सा विधान*
*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
*-----------------------*
पंच महाभुतों में पृथ्वी आकाश वायु अग्नि जल*
हैं और जीव उत्पत्ति और उन्नयन में जल की भूमिका महत्व पूर्ण है।
ऋग्वेद में जल की अरोग्यता गुण और चिकित्सा
महत्व को बताया गया है कई बार ऐसी बीमारियां हमें सताने लगती हैं, जिनका
बेहतर उपचार पानी से ही होता है। इस प्रक्रिया को जल चिकित्सा कहते हैं। पेट से
संबंधित रोगों में जल की भूमिका अति आवश्यक होती है। त्वचा रोगों, कब्ज,
अनिद्रा, थकान, जोड़ों के दर्द,
मिर्गी, डायबिटीज, व गुर्दे के रोग कई अन्य रोगों में जल चिकित्सा
बेहद असरदार होती है आयुर्वेद में जल क्रीड़ा तैरना सबसे उत्तम और स्वास्थ्य के
उपयोगी व्यायाम बताया गया है।
जल चिकित्सा. जिसे आधुनिक भाषा में हाइड्रोपैथी
कहा जाता था और जिसे वाटर क्योर भी कहा जाता था , जल
चिकित्सा एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है
और आज की फिजियोथेरेपी की एक शाखा है , जिसमें दर्द से
राहत और उपचार के लिए पानी का उपयोग शामिल है । इस शब्द में दृष्टिकोण और उपचारात्मक
तरीकों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है जो रक्त परिसंचरण को प्रोत्साहित करने और
कुछ बीमारियों के लक्षणों का इलाज करने के लिए तापमान और दबाव जैसे पानी के भौतिक
गुणों का लाभ उठा कर रोग मुक्ति में सहायक है।
.
जल चिकित्सा एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है-
प्राकृतिक, आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में जल
का काफी महत्व है।
इकाई 1जल तत्व परिचय, जल
चिकित्सा की अवधारणा, महत्व एवं सावधानियाँ
कौन सा स्नान किस रोग में विशेष लाभकारी अथवा
प्रभावी सिद्ध होती है ?
जल चिकित्सा की विधियाँ -
जल चिकित्सा के लाभ और , महत्व।पंच
तत्वों से बने शरीर को जल की अत्यधिक आवश्यकता है जीवन का मूल जल है जल चिकित्सा
से अनेक रोग प्राकृतिक रूप से ठीक हो जाते हैं।
शरीर का तीन चौथाई भाग पानी से बना है हम रोज
विभिन्न रूपों में पानी ग्रहण करते हैं नाहने में भी हम पानी का उपयोग करते हैं
जिससे हमारा शरीर ठीक से काम करता है स्वस्थ और साफ रहता है जल का असंतुलन शरीर
में अनेक रोगो को जन्म देता है पेट के रोगो में जल की महत्वपूर्ण भूमिका है कब्ज़
और किडनी मिर्गी रोगी मधुमेह अनिद्रा थकान जोड़ों के दर्द में जल चिकित्सा अति
उपयोगी है।
अनिद्रा:
अनिद्रा या नींद न आने का कारण मानसिक अ
स्वस्थता पेट में गैस बंद हजमी देर तक जागने की आदत चाय या काफी का अधिक सेवन शरीर
में दर्द बेचैनी आदि होता है ।
व्यक्ति को रात को नींद नहीं आती रातभर करवटें
बदलते भीतरी है रात में एकबार नींद खुलने पर दोबारा नींद नहीं आती सुबह उठने पर
शरीर में दर्द भारीपन रहता है इस के लिए रात में हल्का सुपाच्य भोजन करें सोने से
पहले और रात के खाने के एक घंटे पहले या बाद में सर्दियों में गुनगुना पानी से और
गर्मी में शीतल जल से स्नान करें शिर पर पानी की धार छोड़े सोने से पहले गुनगुना
पानी एक टब में करके पैरों को डूबोकर बैठ जायें दस मिनिट बाद पैरो को साफ तौलिए से
पौंछ कर हवादार कमरे में आराम दायक बिस्तर पर सोने का उपक्रम करें ।
पेट में गैस जलन:
जब पेट में पित्त अधिक हो आमाशय में जलन हो गैस
हो तब रोगी को नमन(उल्टियां)करा कर आमाशय शुद्ध करना चाहिए इसके लिए ५-६गिलास पानी
सामान्य गरम पानी में ५-६, चम्मच नमक मिलाकर" काग" आसन
में बैठकर पीना चाहिए फिर ५०कदम चलकर काग आसन में बैठ कर सिर को नीचा कर वमन द्वार वह पानी निकाल देना
चाहिए
इससे
पेट की गैस हाइपर एसिडिटी जलन पेट दर्द ठीक होता है इसे कुंजन क्रिया कहते हैं
सावधानी उच्च रक्तचाप के रोगी चिकित्सक की सलाह से ही कुंजन क्रिया करें।
पाचन क्रिया बेहतर करने और मासिक धर्म नियमित
करने के लिए:
एक बाथ टब में गर्मी के मौसम में सामान्य पानी
सर्द मौसम में गुनगुना पानी भर लें रोगी
को उसमें लेटा दे पैर बाहर निकल दें सिर पर गिला कपड़ा रखदेंरोगी को एक तौलिया से
नाभि धीरे धीरे रगड़ने को कहें यह क्रिया कम से कम२० से ३० मिनट तक करे प्रति दिन
कुछ दिनों तक करने से बदहजमी कब्ज़ मोटापा मधुमेह ठीक होता है स्त्रियों का मासिक
धर्म नियमित होता है।
नजला ज़ुकाम साइनस :
नजला ज़ुकाम साइनस के लिए नेती क्रिया सबसे
बेहतर है इसके लिए आप एक लोटा गुनगुना पानी में १/२, चम्मच
नमक मिलाकर लोटे को नाक से लगाते मुंह खोल कर नाक के एक नथुने से पानी खिंचे दुसरे
से बाहर निकाले।
इससे बारंबार होने वाला नजला ज़ुकाम ठीक होता
है साइनस नाक में मांस बढ़ना ठीक होता है।
मिर्गी के दौरे:
मिर्गी के दौरे अचानक मस्तिष्क के संबेदी भाग
में अचानक प्रवाह के कारण होता है आम तौर पर यह दौरा 5-6मिनट का होता है यह काफी
खतरनाक होता है कभी कभी तो रोगी का मूल और पेशाब निकल जाता है।
लक्षण दौरे के समय शरीर के किसी अंग का टेढ़ा
होना मुंह से झाग आना दर्द होना।
उपचार *रोगी को विस्वास में ले उसे यकीन दिलाये
वह ठीक हो जायेगा रोगी के सिर पर गीला तौलिया बांधें रोगी के पैर गुनगुना पानी की
बाल्टी में रक्खे रोगी की कमर पर पानी की धीरे धीरे धार छोड़े यह क्रिया 20मिनट तक
करना चाहिए गर्मी के मौसम में सामान्य जल सर्द मौसम में गुनगुना जल का प्रयोग करें
यदि रोगी एक बार में यह क्रिया करने में असमर्थ हो तो दिन में दोबार 10-10मिनट
करना चाहिए
सिर दर्द
सिरदर्द होने पर कुछ लोग दर्द निवारक गोलियां
खाते हैं जो आपके आहार तंत्र को तो नुकसान करता ही है आपकी किडनी को भी खराब करता
है सिर दर्द होने पर आप गर्म पानी चाय की तरह सिप करके टीमें सिरका दर्द जादू की
तरह ठीक हो जाता है।
पैर की एड़ी तलुओं में दर्द
एड़ी और तलुओं में दर्द के लिए आप दो बर्तन ऐसे
ले जिसमें अपके पैर आजायें एक बर्तन में गर्म पानी और एक बर्तन में सामान्य पानी
भर लें दर्द वाले पैर को पहले गरम पानी में रक्खे दो मिनट तक फिर निकाल कर ठंडे
पानी में रक्खे यह क्रिया 10मिनट तक प्रति दिन दौहरायें आप देखेंगे तमाम दवाई खाने
के बाद भी जो दर्द ठीक नहीं हो रहा था वह कुछ दिनों में ही ठीक हो गया।
वापस स्नान ,:
वापस स्नान द्वारा त्वचा को सक्रिय कर शरीर में
संचित विषो को बाहर निकाला जाता है जिससे वात दर्द बदन दर्द को राहत मिलती है
किडनी दबाव मुक्त रहती है युरिक एसिड कम होता है किटेनिन कम होता है।
विधि:
बाण
वाली चारपाई पर जिसपर रोगी के लेट कर पैर पूरे जाते एक सूती पतला कपड़ा बिछा दें
रोगी को एक लीटर या जीतना वह पी सकता है पानी पीला कर चार पाई पर लेटा दे रोगी के
सिर पर गिला कपड़ा रखले उपरसे दो कंबल ओढ़ा दे मुंह और सिर को कंबल से बाहर ही
रक्खे जिससे श्वास क्रिया में बाधा न हो कंबल के अंदर कोई भी बाहरी हवा अंदर न घुस
पाये एक बड़े बर्तन में पानी तेज गरम कर चारपाई के निचे रख दें चारपाई को चारों ओर
से कवर कर दें ।दुसरा तरिका यह है बेंत की कुर्सी पर रोगी को बैठादें रोगी के सिर
पर गीला कपड़ा रखदेंरोगी को आधा लीटर पानी पीला दें कंबल से ढांक दे कुछ दूर गैस
पर कुकर में पानी गरम करें कुकर की सीटी
निकाल कर वहां पाईप लगा कर वापस को कुर्सी के निचे से छोड़ें दोनो ही क्रिया से
रोगी को बहुत पसीना आतयेगा पसीने के रास्ते शरीर में जमा अशुद्धियां बाहर निकल
जायेंगी और कमर दर्द जोड़ों का दर्द ठीक हो जायेगा केटनिन का स्तर कम होगा यूरिक
एसिड कम होगा शरीर हल्का महसूस होगा
रोगी
को गर्मी महसूस होने पर या उच्च रक्तचाप
के रोगी चिकित्सक की सलाह से ही वापसन करें।****
जल चिकित्सा वरदान है किडनी डिज़ीज़ के रोगीयों
के लिए
किडनी रोगी यों को नहीं कराना होगा डायलैसिस
नहीं कराना होगा किडनी ट्रांसप्लांट।
हम जो
भी खाते हैं उसमें एक वो सुक्ष्म पोषक
तत्व जो हमारा शरीर ग्रहण करता है और उसे उर्जा में बदलता है दुसरे वह पदार्थ जो
शरीर ग्रहण नहीं करता जिसे हम पाचक रस से निकलने
वाला वेस्ट कहते हैं जिनमें यूरिया यूरिक एसिड केटनिन सोडियम कुछ प्रोटीन
मुख्य है जिन्हें हमारी किडनी पेशाब के रास्ते बाहर निकालने का काम करती है यानी
डायलेसिस करती है किडनी ख़राब होने पर यह प्रक्रिया नहीं हो पाती और खाने के विषाक्त पदार्थ अशुद्धियां
शरीर में जमा होने लगती है जिसके जहरिले
प्रभा नजर आने लगते है जिससे शरीर पर सूजन श्वास फूलना आदि लक्षण होते हैं किडनी तो काम कर नहीं रही जमा हो गये जहरीले
पदार्थ को आधुनिक मशीनों के द्वारा रक्त से बाहर निकालने की क्रिया को डायलैसिस
कहते हैं किडनी ख़राब होने की प्रारम्भिक अवस्था में यह १५दिन में एक बार परंतु
जैसे जैसे किडनी की काम करने की छमता घटती है डायलैसिस का समय भी घटता जाता है
८दिन४दिनफिर२दिन फिर किडनी ट्रांसप्लांट या.......
हमारे शरीर में दो किडनी होती है जिन्होंने काम
करना बंद कर दिया है जल चिकित्सा से शरीर की तीसरी किडनी" त्वचा "
आयुर्वेद त्वचा को तीसरा गुर्दे भी कहा जाता है जो पेशाब की तरह है पसीने के
रास्ते शरीर की अशुद्धियों को बाहर निकाल ती है त्वचा की पसीना लाने वाली
ग्रंथियों को सक्रिय करके डायलेसिस से बचा जा सकता है और किडनी को दोबारा क्रिया
शील कर सामान्य जीवन जी सकते हैं।
पसीने और पेशाब में पाये जानेवाले अपषिष्ट पदार्थों को यदि हम लैबोरेटरी
में टेस्ट करते हैं तब हमें ज्ञात होता है दोनों में एक जैसे हैं केटनीन यूरिया
यूरिक एसिड सोडियम आदि किडनी पेशाब के रास्ते अपशिष्ट को बाहर निकालती है और त्वचा
पसीने के द्वारा वही काम करती है जो हमारी किडनी करती है वही काम हमारी त्वचा करती
है आवश्यकता है त्वचा की स्वेद ग्रंथियों
को जल चिकित्सा द्वारा उत्तेजित कर ने की
विधि :
किडनी डिज़ीज़ के रोगी को 38से40 डिग्री सेल्सियस पानी के ऐसे बाथ टब में
दो घंटे प्रतिदिन बैठाया जाता है जिस बात टब का तापमान38से 40, डिग्री
सेल्सियस पर नियंत्रित किया जा सकता हो या बार बार वाटर टैम्प्रेचर मीटर की सहायता
से नाप कर प्रति 10मिनट बाद नाप कर ताप मान को नियंत्रित किया जाये रोगी को बाथ टब
में लेटाने से पहले पानी पिला देना चाहिए और रोगी के सिर पर निचोड़ कर गिला सूती कपड़ा रखदें रोगी का सिर गर्दन से
उपर बाहर रखें यदि रोगी एक बार में दो घंटे नहीं बैठ सके तो यह क्रिया एक एक घंटे
के लिए दिन में दो बार कराना चाहिए 10दिन की नियमित क्रिया से डायलेसिस की
आवश्यकता नहीं रहे गी 40दिन बाद रोगी 90%तक ठीक हो जाता है।इसके साथ ही ७पतते पिपल
और एक मुट्ठी नीम के पत्तों का स्वरस
पुनर्नवा गोखरू मकोय का क्वाथ अथवा स्वरस पीने को देने से किडनी की कार्य
प्रणाली में सुधार होगा।
पानी की कमी(डिहाईड्रेशन )
पानी की अधिकता
*--------------------*
पंच
यहां भूतों पृथवी आकाश अग्नि वायु और जल
से ही समस्त प्रकृति की रचना हुई है पानी मानव ही नहीं समस्त जीवधारियों
पेड़ पौधौ के लिए आवश्यक
सोशल मीडिया पर रोज ज्ञन दिया जा रहा है वयस्क
व्यक्ति को प्रतिदिन 5लिटर पानी पीना चाहिए कुछ का कहना है पानी 3.5लिटर पिता चाहिए*
वास्तव में स्वस्थ रहने के लिए पानी पीने की मात्रा मौसम(गर्मी या सर्दी) व्यक्ति
का काम वह शारीरिक श्रम करता है या मानसिक श्रम करता है कै सा भोजन किया है निवास
कहां करता है इस पर निर्भर करता है यदि आप पर्याप्त पानी पी रहे हैं तो
आप का पेशाब हल्का पीला या रंग हीन होगा
आपको बारबार प्यास नहीं लगती
आपका पाचनतंत्र सुचारू रूप से काम कर रहा होता
है।
आपके शरीर में ऊर्जा के स्तर की कमी नहीं रहती
जल्दी थकावट नहीं होती।
आप ४घंटे या इसके बाद पेशाब जाते हैं।
आवश्यक यह भी है की मनुष्य को 24घंटे में पानी
कितना पीना चाहिए जिससे वह स्वस्थ रहे यह कोई निश्चित नहीं है पानी पीने की मात्रा
डिहाइड्रेशन शरीर में पानी की कमी क्यों होती
है कारण और लक्षण।
कम पानी पीना उल्टी आना, डायरिया,
अत्यधिक पसीना आना, सुरज
के ताप में रहना (सन हीट)जलन, किडनी की खराबी, और
डाईयूरेटिक के उपयोग से डिहाइड्रेशन होता है।
लोग
प्यासा महसूस करते हैं, प्रारंभिक लक्षण अगर यूरीन का रंग ज्यादा पीला
है तो इसका मतलब है कि आप कम पानी पी रहे हैं.
गंभीर डिहाइड्रेशन में, प्यास की
संवेदना वास्तव में कम हो सकती है और ब्लड प्रेशर गिर सकता है, जिसके
कारण सिर चकराना या बेहोशी हो जाती है, विशेषकर खड़े
रहने पर (एक स्थिति जिसे ऑर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन कहते हैं)। यदि डिहाइड्रेशन जारी
रहता है, तो आंतरिक अंगों, जैसे किडनी, लिवर,
और दिमाग को आघात हो सकता है
निर्जलीकरण: लक्षण और कारण
निर्जलीकरण के लक्षण क्या हैं? पानी की कभी सबसे प्रारंभिक लक्षण
प्यास का बढ़ना है मुंह का सूखना गले में खरास · सिरदर्द ,
उन्माद और भ्रम। · थकावट ( थकान ). · चक्कर
आना , कमजोरी और हल्का सिरदर्द। · शुष्क मुँह
और/या सूखी खाँसी। · उच्च हृदय गति लेकिन कम रक्तचाप . · भूख
न लगना , लेकिनजब शरीर में पानी की कमी होती है तो पेशाब गाढ़े पीले रंग का
आता है ब्लड में सोडियम का स्तर गीर जाता है। इसके साथ मात्रा में सामान्य से कम
आता है आपको भी लगातार रह रहकर सिरदर्द बना हुआ है, तो ये
पानी की कमी का संकेत भी हो सकता है। बता दें, कि यह
डिहाइड्रेशन के चलते दिमाग में ब्लड फ्लो और ऑक्सीजन की पूर्ति प्रभावित होने के
कारण होता है।
चिकित्सा :-पर्याप्त पानी पीयें पानी की कभी के लक्षण महसूस होने पर चीनी नमक
का घोल बार बार पीना चाहिए घोल बनाने की विधि एक गिलास पानी (३००मिली)पानी में एक
मुट्ठी चीनी और एक चुटकी नमक मिलाकर घोल तैयार कर लें।
आधुनिक चिकित्सा में ड्रिप विधि से केवल नमक युक्त या नमक और ग्लुकोज़ युक्त पानी
चढ़ाना सबसे बेहतर विकल्प है इससे तुरंत
राहत मिलती है।
अधिक पानी पीने के लक्षण और हानी*
लक्षण:-यदि आप बारबार पेशाब जा रहे हैं
आप के पेशाब का रंग एकदम साफ है,आपका
पेट फूला हुआ रहता है,आपको मतली आना और उलटि आना जैसा रहता है पानी
पीने के बाद जोड़ों का रंग बदल जाता है ,आपको हमेशा हर
दर्द रहता है अधिक पानी पीने से त्वचा में जल संचय होने से सूजन आ जाती है
मांसपेशियों में कमजोरी और थकान मुख्य लक्षण है ।
खाना खाने के के बाद स्नान की हानीयां
खाना खाने के तुरंत बाद शरीर का ब्लड सर्कुलेशन और ताप मान कुछ बढ़
जाता है और शरीर की उर्जा केंद्रित होकर खाना पचाने में लगजाती है ।
जब हम खाना खाने के बाद स्नान करते हैं तो
तापमान और ब्लड सर्कुलेशन कम हो जाता है तथा रक्त का प्रवाह शरीर के अन्य हिस्सों
में होने लगता है जिसके कारण पाचन क्रिया धीमी हो जाती है और खाना सही से पच ही
नहीं पाता शरीर को पूरा पोषण नहीं मिलता और आम की वृद्धि होती है जिससे अपच
एसिडिटी गैस जलन यूरिक एसिड जैसी समस्या पैदा होती हैं
इसलिए खाने के एक घंटा बाद तक नहाना नहीं चाहिए।
पानी पीने के पात्र के विषय में
'भावप्रकाश ग्रंथ' में लिखा
है..
जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।
पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।
काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।
(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)
अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक
अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का
उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र प वित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे
बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।
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