*भोजन और स्वास्थ

 



 

 *  भोजन का अर्थ स्वाद मन की त्रप्ति संतुष्टि के साथ ही शरीर का पोषण और रोग प्रतिरोधक शक्ति को बनाये रखना भी है ।

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 आहार (भोजन)ऐसा हो जिसकी गंध से भूख बढ़े मतलब जिसकी गंध मनमोहक हो जो स्वादिष्ट हो शुद्धता के साथ बना हो शुद्ध हो पोष्टिक हो और उस ॠतु में जो खाद्य पदार्थ प्रकृति ने दिया है उससे बना हो अधिक चिकनाई युक्त तिक्त ना हो खाने में जो व्यंजन हों उनकी प्रकृति एक दूसरे के विपरित ना हो खाने के बाद त्रप्ति का अहसास हो  ऐसा महॠषि चरक का कथन है।

 

"*हमारा भोजन वह आधार है जिससे हमारे शरीर का निर्माण होता है. चरक संहिता के अनुसार किसी भी रोग से मुक्ति के लिए उचित आहार लेने का अत्यंत महत्व है. औषधि के प्रयोग से मिलने वाला लाभ उचित आहार लेने से ही मिल सकता है. सही भोजन लेना औषधि लेने से 100 गुना अधिक महत्व पूर्ण और लाभदायक है. आचार्य चरक के अनुसार तो अनुचित खानपान ही शरीर में रोग का मुख्य कारण है. आयुर्वेद के अनुसार भोजन बनाते समय देश, काल और प्रकृति तीनों विचार करना ध्यान देना परम आवश्यक है. इसके साथ ही साथ व्यक्ति को सभी 6 प्रकार के रसों मधुर, अम्ल,लवण, कटु, तिक्त , कषाय   का सेवन (include 6 tastes to overcome nutritional deficiencies) भोजन में करना चाहिए क्योंकि इससे शरीर को हर प्रकार से पौष्टिकता मिलती है. भोजन लेने का काल: जब जठराग्नि अच्छी तरह प्रदीप्त होती है तब ही भोजन करना चाहिए. दूसरे शब्दों में भोजन लेने का सही समय तब है जब ज़ोर से भूख लगी हो. बिना भूख के भोजन नही खाना चाहिए. वस्तुतः सुबह का बाल आहार 8-9 बजे (8-9 A.M.) तक हो जाना चाहिए. 10 बजे (10 A.M.) के बाद बार आहार न लें. मध्याह्न भोजन  (12:00- 2:00 P.M.) बजे के बीच ले लीजिए. 12:00-2:00 यह पित्त का काल है इसलिए यह दिन का सबसे बड़ा, भारी भोजन होना चाहिए. रात्रि का भोजन 6-8 बजे(6:00-8:00 P.M.)के बीच कर लीजिए और यह हल्का और सुपाच्य ही होना चाहिए. रात्रि 9 बजे के बाद भोजन बिल्कुल न लें.वास्तव में भोजन लेने का उचित काल सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य है परंतु आज की जीवनशैली में यह संभव नहीं है. सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद कुछ भी खाएँगे तो वह पचता नही बल्कि पक्वाशय में सड़न उत्पन्न करता है. इसलिए रात्रि को ना खाएँ. भोजन उतना ही लें जिससे आपका आधा पेट भर जाए. एक चौथाई जल के लिए रखीए और बाकी का तीनों दोषों और हवा के लिए होना चाहिए. इसलिए कभी भी पेट भर के भोजन ना करें. ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.।

 

   * सर्वप्रथम मधुर रस के भोजन जैसे कि मीठी खीर मिठाई सलाद इत्यादि का सेवन करना चाहिए. तत्पश्चात आम्ल और लवणीय भोजन को खाएँ. अंत में कसैले, कड़वे और कशाय भोजन का सेवन करना चाहिए.।

 

   * भोजन ग्रहण करने से पहले और बाद में हाथ, पाँव और मुख को धो लेना चाहिए.।

 

    *अच्छा रहे यदि आप एक साफ़-सुथरी जगह में एकांकी होकर  संभव हो तो पालथी मारकर बैठ करभोजन ग्रहण करें. या फिर उन लोगों के साथ बैठकर भोजन करें जिसका साथ प्रेमयुक्त और मधुर है. क्रोधी और कटु शब्द बोलने वालों के साथ बैठकर भोजन नही करना चाहिए.।

 

   * प्रेम से बनाया हुआ भोजन ही सेवन करना स्वास्थ्य के लिए हितकर है. यदि खाना बनाने वाले के मन में कटुता और नकारात्मक विचार भरे है तो वह भोजन खाने से शरीर और मन में रोग उत्पन्न होते है. अगला भोजन तभी लें जब पिछला खाया हुआ पूर्णतया पच गया हो.।

 

    *भोजन के एक ग्रास को 32 बार चबाना चाहिए. सबसे पहले कठोर पदार्थों का सेवन कीजिए. उसके बाद रस-युक्त और तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए.।

 

    *भोजन खाते समय पानी नही पीना चाहिए. इससे पाचक अग्नि मंद पड़ जाती है. भोजन लेते समय पानी का इस्तेमाल विवेक पूर्वक ही यदि आवश्यक हो भोजन के मध्य मे करें. भोजन खा लेने के कम-से-कम 1 घंटे तक जल का सेवन नही करना चाहिए.।

 

    *अधिक गर्म भोजन के सेवन से कमज़ोरी आती है कैंसर जैसे रोग का कारण भी बन सकता है. जबकि ठंडे और बासी भोजन को पचाने के लिए से पाचन तंत्र को अधिक श्रम करना पड़ता ही. इससे अपच भी होता है.इस लिए ताज़ा बना भोजन जो न अधिक गरम हो न अधिक ठंडा हो भोजन करना चाहिए।

 

    *अधिक देर तक या तेज़ आँच पर पकाए भोजन को खाने से ग्लानि आती है. भोजन कम आँच पर पका कर रूचि पूर्ण रूप से बनाना चाहिए.।

 

    *भोजन करने से पहले प्रार्थना द्वारा ईश्वर को अर्पण करके ही भोजन प्राप्त करना चाहिए. इससे भोजन में व्याप्त नकारात्मक उर्जा व्यक्ति को प्रभावित नही करती.।

 

    *भोजन को ग्रहण करने का ढंग ।

 

    *भोजन को बनाने और छकने का ढंग भी इससे मिलने वाले पोषण को निर्धारित करता है. यदि आप उचित आहार से बना हुआ भोजन अनुचित समय और तरीके से लेते हैं तो भी आपको भोजन से लाभ की जगह गॅस, अपच इत्यादि समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है.।

 

    *सर्वप्रथम भोजन एकांत में  ही बैठ कर खायें भोजन सात्विक और प्रीतिकार संगति में ही कीजिए. फल को मुख्य भोजन से या तो 1 घंटा पहले खाएँ अथवा 2 घंटे बाद ही खाएँ. यदि आप साथ में फल खाते है तो आपको गॅस हो सकती है सलाद आदि खाने से पहले खालें खाने के बाद सलाद अपच अजीर्ण का कारण बनता है. ।

 

    *दक्षिण की ओर मुख करके खाना नही खाना चाहिए. पूर्व की तरफ मुख रखकर भोजन सेवन करें.।

 

    * भोजन करने के बाद 100 कदम अवश्य चलें.।

 

   * भोजन के 1-2 घंटे तक व्यायाम या मैथुन ना करें.।

 

    *जब अत्यधिक प्यास लगी हो तो पहले पानी द्वारा इसे मिटाए. इसके 1 घंटे बाद ही खाने खाएँ.।

 

    बहुत थकान होने पर भी भोजन नही लेना चाहिए. विश्राम के बाद ही भोजन ग्रहण करें.।

 

    *भूख लगने पर ही क्षुधा शांत करें.।

 

    *भूख लगने पर भोजन अवश्य खा लें क्यों की ना खाने से शरीर में कमज़ोरी आती और मस्तिष्क की कार्यशक्ति भी घट जाती है, हृदय रोग भी हो जाता हैं. कुछ लोगों को चक्कर भी आने लगते है. बार-बार ऐसा करने से मांसपेशियाँ ढीली होने लगती है.।

 

*भोजन के नौ गुण*

 

*हमारे भोजन में यदि इन नौ गुणों का समन्वय, सामंजस्य और पूर्ति हो तो एक संतुलित आहार बनता है. ये देखने, खाने में रुचिकार, पाचक और पुष्टिवर्धक होता है. नौ गुण इस प्रकार हैं:।

 

    *वर्ण : भोजन की रंगत.।

 

   * प्रसाद: भोजन को देखने और खाने से अनद की अनुभूति होना.।

 

   * सुखम: आरामदायक और पुष्टि प्रदायक गुण.।

 

   * संतुष्टि: भोजन ग्रहण करने के पश्चात संतुष्टि का अनुभव होता है.।

 

   * सौस्वरयम: आपको हैरानी होगी लेकिन भोजन में भी लयात्मकता होनी चाहिए. हर शाख के साथ प्रयोग होने वाले उचित मसाले होते हैं या भोजन को पकने की विधि का तदात्मय भी आवश्यक है.।

 

    *पुष्टि: भोजन द्वारा पुष्टि की प्राप्ति हो.।

 

   * प्रतिभा: कौशल या योग्यता में कितनी वृद्धि करता है .।

 

   * मेध: बुद्धि.।

 

   * बल:  रोग प्रतिकारक शक्ति और पुष्टि.।

दोषों को शांत करने वाला और शारीरिक मानसिक बल को बढ़ाने वाला भोजन ही उत्तम आहार है।

यह पोस्ट आयुर्वेद के आहार विज्ञान की सामान्य जानकारी उपलब्ध कराती किसी भी चिकित्सा अथवा आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अथवा चिकित्सा का विकल्प नहीं है।

यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534

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19/07/2024, 5:39 am - Yashpal S Barampur: (३५)

*भोजन के नियम*

*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*

 

*खाना खाते समय अपनाएं ये नियम, कभी नहीं पड़ेंगे बीमार*

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आयुर्वेद में आहार और भोजन के संबंध में कई नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करने पर बीमारियों से तो बचाव होता ही है, स्वास्थ भी अच्छा रहता है और लंबी उम्र मिलती है। इन नियमों में खाने के समय से लेकर मात्रा और प्रकार के बारे में भी बताया गया है। जानिए ऐसे ही 20 नियमों के बारे में

 

1 सुबह का नाश्ता पेट भर कर ले, लंच उससे 30% कम और डिनर लंच से 30% कम ले।

 

2 विपरीत गुण वाले फूड को एक साथ न खाए जैसे दूध के साथ दही, दूध और नमक दूध और मूली या करेला और भिंडी मछली आदि  इससे नुकशान हो सकता है।

 

3 खाना हमेसा बैठकर ही खाए खड़े होकर या चलते चलते खाने से कई तरह की बीमारियाँ हो सकती है।

 

4 बगैर भूख के भोजन न करे. इससे खाना डाइजेस्ट नहीं होता ओर गैस, बदहजमी जैसी प्रॉब्लम हो सकती है

 

5 पहले खाया हुआ पचने के बाद ही दूसरी बार खाए. खाने के बीच 4-5 घंटे का अंतर होना चाहिए

 

6 जल्दी जल्दी न खाए, खाना अच्छे से चबाकर खाए. इससे लार अच्छी बनती है ओर खाना जल्दी पचता है

 

7 खाते समय हँसना, बात करना नुकसानदायक हो सकता है. खाना गले या साँस की नली में फंस सकता है।

 

8 भूख से थोडा कम खाए. पेट में 20% जगह खाली रखे।

 

9 खाने के समय नेगेटिव इमोशन्स न रखे. शांत और प्रसन्न मन से भोजन करे।

 

10 हमेशा गर्म ओर ताजा खाना ही खाए. इससे खाना अच्छे से हज़म ( डाइजेस्ट) होता है

 

11 खाने में ठोस (सॉलिड) और तरल (लिक्विड) का अनुपात 70:30 का रखे

 

12 लंच के बाद 10-15 मिनट रेस्ट करे (सोए नहीं). डिनर के कुछ देर बाद 10-15 मिनट जरुर टहलें।

 

13 डिनर के 3-4 घंटे बाद ही सोएं. इससे पहले सोने से खाना अच्छे से डाइजेस्ट नहीं होता।

 

14 खाना खाने के करीब आधा घंटे तक पानी न पिएं. इससे डाइजेशन अच्छा होता है।

 

15 खाने में चिकनाई की मात्रा प्रर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए ताकि वह आंतों में अच्छी तरह सरक सके।

 

16 खाना खाने वाली जगह साफ़ सुथरी और शांत होना चाहिए. गंदगी ओर शोर शराबे वाली जगह में ना खाए।

 

17 आयु ओर प्रकृति के अनुसार ही भोजन करना चाहिए. 40-45 की उम्र के बाद हल्का खाना ही खाएं।

 

18 खाने में कार्बोहाईड्रेटस, प्रोटीन ओर फाइबर का बैलेंस होना चाहिए. साबुत अनाज, सब्जियां, दाले फलियां फ्रूट्स, घी, दही वगेरह शामिल हो।

 

19 नहाने के तुरंत बाद ना खाए ओर न ही खाने के तुरंत बाद नहाए।

 

20 खाना खाने से पहले अच्छी तरह हाथ पैर अच्छे से धुल लें. गंदे हाथो से, गंदे बर्तन में या गंदगी में बना हुआ खाना न खाए।

यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534

19/07/2024, 6:25 pm - Yashpal S Barampur: (२१)

*संतुलित भोजन (Balanced Diet)

*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*

 

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*आज का आधुनिक  विज्ञान जिसे कैलोरी कहता है अथर्ववेद में उसे सुक्ष्म पोषक तत्व कहा गया है या ये कहें खाद्य पदार्थ में शरीर रूपी इंजन को चलाने के लिए मिलने वाली ऊर्जा को कैलोरी कहते हैं जिनकी मात्रा अलग अलग खाद्य पदार्थों में कम या अधिक होती है यदि हम अधिक शारीरिक श्रम नहीं करते तब हमें अधिक ऊर्जा वाले(कैलोरी वाले) खाद्य पदार्थ नहीं खाने चाहिऐं इससे हमारे शरीर में ऊर्जा का संचय होने लगता है जिससे मोटापा दिल की बिमारी मधुमेह किडनी डिजीज आदि हो सकता है।

 

*संतुलित भोजन (Balanced diet) या बैलेंस डाइट वह है जिससे शरीर को सुचारू रूप से चलने के लिए संपूर्ण पोषण मिल सके। संतुलित भोजन के लिए हर रोज शरीर की जरूरत के हिसाब से कैलोरी, विटामिन, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट लेना जरूरी होता है। पोषक तत्वों के अभाव में व्यक्ति का शरीर कमजोर होने लगता है और अलग- अलग बीमारियों से घिर जाता है।

 

अथर्ववेद के विद्वान ऋषि का कहना है हमारे आहार में ३०%, अम्ल और 80%,क्षार की मात्रा होना चाहिए परंतु आज हमारी जीवन शैली बदल गयी है मैदा से बने आहार मैगी चाऊमीन पिज्जा बर्गर समोसे सभी अम्लता बढ़ाते है  वैसे तो सभी सब्जियां क्षारिय होती है परंतु आज सब्जी और फलों में उपयोग होने वाला फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड उन्हें अमलिय बनाता है दाल और सब्जियां (अधिक उबालने)पकने के बाद अपना क्षारियता कम हो जाती है अंकुरित अनाज क्षारिय होता है दाल में प्रोटीन होता है शरीर में जाकर प्रोटीन जब टूट्ता है अम्ल पित्त बनता है चीनी शरीर के लिए उर्जा का स्रोत है परंतु अम्ल पित्त को बढ़ाती है लौकी का जूस क्षारिय है परन्तु लौकी से बनी सब्जी क्षारिय नहीं है इस लिए खाने में अधिक से अधिक प्रकृति जैसा दिया है प्रकृति से जैसा मिला है उसी रुप में खाना लाभदायक है  सलाद और मौसमी फलौ का खाने में प्रयोग तथा अंकुरित अनाज का प्रयोग उत्तम माना जाता है।

 

*कैलोरी (Calorie)*

*कैलोरी, भोजन का वह हिस्सा है जो शरीर को ऊर्जा (Energy) देता है साथ ही शरीर में ऊर्जा को बचा कर भी रखता है। भोजन में मौजूद कैलोरी से ही शरीर चलता-फिरता और अपने सब काम करता है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 2000 कैलोरी की आवश्यकता होती है जिससे उसका शरीर बिना थके काम कर सके। हालांकि व्यक्ति की प्रतिदिन की कैलोरी की मात्रा उसकी उम्र, जेंडर और शारीरिक मेहनत पर भी निर्भर करती है। पुरूषों को महिलाओं की अपेक्षा अधिक कैलोरी की आवश्यकता होती है।

 

*संतुलित भोजन में क्या क्या हो (What to have in Balance Diet)*

*संतुलित भोजन में ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए जिनमें विटामिन, मिनरल, और पोषक तत्व उच्च मात्रा में हों और वसा तथा शुगर कम मात्रा में हो अम्लता न बढायें। नीचे कुछ खाद्य पदार्थ बताए जा रहे हैं जो संतुलित भोजन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें रोज के भोजन में शामिल कर, शरीर को जरूरी पोषक त्त्व दिए जा सकते हैं।

 

*फल (Fruits):-*फलों में न केवल पोषक तत्वों की उच्च मात्रा होती है बल्कि यह जल्दी पचने वाले, आसानी से उपलब्ध भी हो जाते हैं। भूख लगने पर बिना झंझट तुरंत इन्हें खाया जा सकता है। फलों को मौसम के अनुरूप ही खाएं जिससे केवल स्वाद ही न मिले आपको ताजे और शरीर को फायदा पहुंचाने वाले फल मिल सकें।

 

*सब्जियां (Vegetables):-* सब्जियां खनिज और विटामिन पाने का सबसे आसान तरीका है। ऐसे में रोज के भोजन में ज्यादा से ज्यादा सब्जियों को शामिल करें। हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ विभिन्न रंगों की सब्जियों से आपको अलग-अलग पोषक तत्व मिल जाते हैं। पालक, बीन्स, ब्रोकली आदि ज्यादा से ज्यादा खाएं।

 

*अनाज (Grain):-*सफेद चावल और सफेद ब्रेड यानि की मैदा से बने खाद्य पदार्थों की जगह ब्राउन राइस और ब्राउन ब्रेड (चोकर सहित आटे से बना ब्रेड)आदि को अपने खाने में शामिल करें। अंकुरित अनाज साबुत अनाज, जैसे दलिया आदि भी शरीर को बेहद फायदा पहुंचाता है। साबुत दालें भी रोजाना खानी चाहिए।

 

*प्रोटीन (Protein):-*मीट और बीन्स, प्रोटीन के प्राथमिक स्रोत हैं, जो शरीर की मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं साथ ही दिमाग को भी तेज बनाते हैं। लो फैट मीट जैसे चिकन, मछली आदि स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर होते हैं। अंडे, दालें, सूखे मेवे, टोफू, पनीर आदि भी प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं।

 

*डेयरी उत्पाद (Dairy product):*- डेयरी उत्पादों में कैल्शियम, विटामिन डी और दूसरे पोषक तत्व होते हैं हालांकि वसा भी डेयरी उत्पादों में अधिक होती है। ऐसे मेआप ताज़ा गाय का दूध  का इस्तेमाल किया जा सकता है गाय के दूध में फेट की मात्रा कम होती भैंस का दूध यदि सेवन करना है अधिक आयु के व्यक्ति कम इस्तेमाल करें।

 

*वसा और कम मीठा (Less fat and sugar):-* वसा और चीनी, दोनों ही शरीर को ऊर्जा देते हैं लेकिन जब हम उन्हें जरूरत से ज्यादा खाते हैं तो हमारे शरीर में ज्यादा मात्रा में ऊर्जा संचरित हो जाती है, इतनी कि हम खर्च नहीं कर पाते। इसी का नतीजा है कि शरीर में वसा एकत्र होने लगती है और शरीर मोटा होने लगता है। इस वजह से शरीर में टाइप 2 डायबिटीज, हृदय संबंधी रोग, कैंसर और स्ट्रोक जैसी बीमारियां हो जाती हैं गुड़ सुपाच्य है और खनिज लौह कैल्शियम विटामिन बी कॉम्प्लेक्स से भर पूर है गुड़ भूख बढ़ाता है  गुड़ का सेवन निरापद है खाना पकाने के लिए सरसों राई मूंगफली आदि का कच्ची घानी का तेल अल्प मात्रा में लाभकारी है देशी गाय का देसी घी खाना उपयोगी है।

यह पोस्ट आयुर्वेद की सामान्य जानकारी उपलब्ध कराती है किसी भी चिकित्सा अथवा आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अथवा चिकित्सा का विकल्प नहीं है।

यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534

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