भारतीय आहार विज्ञान और आधुनिक फ़ूड न्यूट्रीशन *
*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
* भारतीय (आयुर्वेद) बनाम आधुनिक ( फ़ूड,
न्यूट्रीशन) का तुलनात्मक अध्ययन*
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*कहते हैं कि भोजन की खोज भारत में हुई है , पश्चिमी
देशों में तो भोजन है ही नहीं केवल पेट भरने मात्र का साधन है । यहां सैकड़ो
-हजारों व्यजन ऋतुओं व त्योहारों के अनुरूप हैं ।भारत में एक ही फल, सब्ज़ियों
की सैकड़ों प्रजातियां पायी जाती है । जैसे आम की 500 प्रजातियां , धान
की 400 प्रजातियां , गेहूं की सैकड़ों प्रजातियां , आलू
की 25 प्रजातियां , और सब ऋतुओं के अनुसार प्रयोग की जाती थी । किस
प्रवृति के लोगों को क्या खाना है , किस मौसम में क्या खाना है सब कुछ
परंपरागत तरीके से भारत में होता था ।
*भारत में छह ऋतुएँ है , और ऋतुओं
के अनुरूप भारतीय त्यौहार है , इन त्योहारों का हमारे भोजन से बड़ा
गहरा संबंध है , हर त्योहार पर मिठाई , बचपन से
लेकर आज तक त्योहारों पर बहुत मिठाई खाने को मिलती है लेकिन कुछ सालों से आज लोग
त्योहारों पर मिठाई की बजाय नमकीन देना पसंद करते है , उन्हें
लगता है मिठाई जैसे अछूत है , यह तो गरीब और मजदूरों के लिए है ।
लेकिन उन्हें यह ज्ञात नहीं कि मिठाई से ज्यादा नमक नुकसान करता है । खुद तो बिगड़े हुए हैं ही अपने बच्चों को और
ज्यादा बिगाड़ रहे हैं ।
*हमने बचपन में सामान के लिए मिले पैसे बचाकर मिठाई खाने के लिए मार खायी है लेकिन आज
बच्चे नमकीन चुराकर खाने के लिए मार खा रहे हैं ।
*वर्तमान शिक्षा पद्धति द्वारा फ़ूड एंड
न्यूट्रीशन के नाम से लोगों को पौष्टिकता के बारे में जागरूक किया जा रहा है और
आयुर्वेद हज़ारों वर्षों से जन सामान्य को पौष्टिकता और साथ ही साथ उस भोजन का
हमारे भविष्य और आज के सम्पूर्ण स्वास्थ्य पर असर को बताता आया है ।
*आज अंडे को सबसे अधिक पौष्टिक मानकर खाने की
सलाह विज्ञान की पुस्तक में बच्चों को दी जाती है, पर इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि
ये अंडे बनने कैसे हैं यह बच्चों को क्यों
नही सिखाया जाता है ? और इसका कितना गलत असर हमारे शरीर पर गलत पड़ता
है ?
*विज्ञान की किताबों में चिकन मटन को प्रोटीन
का सोर्स बताया जाता है। जबकि यह किसी जीव की हिंसा कर प्राप्त होते है। इसका हमारे भविष्य पर बहुत बुरा असर होता है ,
क्योंकि यह हमारे बुरे कर्मों को बढाता है। साथ ही ऐसे अन्न का असर
हमारे वर्तमान पर भी बहुत बुरा होता है क्योंकि इससे अनेक बीमारियाँ होती है।
हिंसा से प्राप्त भोजन हमारे अन्दर अनेक विकार उत्पन्न करता है ऐसी बातें बच्चों
को नहीं सिखाई जाती हैं ।
*इसी तरह भोजन की तासीर को जाने बिना किसी भी
रोगी को कुछ भी खाने को दिया जाता है । सर्जरी के बाद पेशंट को छोले खिला दिए जाते
है।
*आज का विज्ञान सिर्फ शरीर को पुष्ट करने पर
ध्यान देता है , जबकि आयुर्वेद ओजस के माध्यम से हमारे तेज
कांति आरोग्यता पोषटिकता षोषण को भी बढाने पर ध्यान देता है ।*
*आज का विज्ञान खाने के ऋतु और समय से सम्बन्ध
को नकारता है। जबकि आयुर्वेद में हर भोजन के साथ उसके खाने का समय और ऋतु का भी
वर्णन है । इसका पालन करने से व्यक्ति बीमार पडेगा ही नहीं।
*आज के विज्ञान में भोजन बनाने के तरीकों पर
ध्यान नहीं दिया जाता और अक्सर विरुद्ध आहार को सही माना जाता है , जैसे- सूप में दूध मिलाना ।
*जबकि आयुर्वेद के नियम आहार विज्ञान को अपनाने
से बिमारी पास भी नहीं आएगीl
*आज का विज्ञान घी से दूर रहने की सलाह देता है
और रिफाइंड तेलों पर जोर देता है. जबकि आयुर्वेद में घी और कच्ची घानी के तेलों का
सेवन ज़रूरी बताया गया है।
कहते हैं जिसने अपने भोजन को पहचान लिया वह
वीमार पड़ेगा ही नहीं, इसलिए भोजन को स्वाद के लिए नहीं अपितु तृप्ति
के लिए कीजिएl
*कहने का तात्पर्य यह है आप की खाने की थाली
में रक्खे खाद्य पदार्थ जो ॠतु अनुसार हों और एक दुसरे का विरुद्ध ना हो
स्वास्थ् के लिए हित कारी हो ऋतु सम्मत
हो मर्यादित हो आपके स्वास्थ्य और निरोगी
जीवन की गारंटी है।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न
*भारतीय आहार विज्ञान *
भाग-३
**आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
आयुर्वेद विद्वानों ने स्वास्थ रहने के संबंध में दो नियम बताए
हैं
१.रोगी होकर रोग का उपचार करें
२
.आरोग्य की रक्षा करें ,
अर्थात ऐसा भोजन करें जिससे रोगी हों ही नहीं और अपनी दैनिक दिनचर्या को
व्यवस्थित करें कि शरीर मे रोग का जन्म ही न हो
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वांग भट्ट जी कहते हैं स्वास्थ्य का संबंध आहार
से है हम जो भी खाते हैं उससे ओज बनता है ओज से रस बनता है और रस ही है जो शरीर को
पोषण देता है 90%रोग हमारी गलत दिनचर्या तथा विरुद्ध आहार तथा गलत खान पान के *गलत
समय *मौसम और व्यक्ति की प्रकृति के विपरित आहार
सेवन के करण होते हैं।
वांग भट्ट जी
लिखते है दिनचर्या को ठीक और व्यवस्थित कर के, योग और
प्राणायाम को अपनाकर आयुर्वेद के विद्वानों द्वारा बताते आहार को अपनाकर विरुद्ध
आहार का विचार करें मौसम के अनुसार फल सब्जी अनाजों का सेवन कर के स्वास्थ्य रहा
जा सकता है ।
आयुर्वेद में स्वास्थ का दुसरा नियम है रोग
होने पर रोग के अनुसार विभिन्न औषधियों का सेवन करके रोग मुक्त होना दिॆर्ध आयु के
लिए ॠग वेद में स्वास्थ के पहले नियम के बारे में बताया गया है। यदि व्यक्ति रोगी
होने पर अपनी दिनचर्या और आहार ठीक करले तो रोगी जल्दी स्वस्थ हो जाता है ऋग्वेद
वेद में दूसरे नियम को सर्वोत्तम बताया गया है अच्छा हो हम रोगी ही ना हों भारतीय
आहार व्यवहार दिन चर्या यम नियम योग और व्यायाम का पालन करें।
- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से(आहार से) होते है,
पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी ।।
- 103 प्रकार के रोग भोजन के बाद जल पीने से
होते हैं, भोजन के
आधे से पौन घंटे बाद या पहले ही जल पीना चाहिये कुछ आहार विशेषज्ञ का यह भी कहना
है यदि आप पानी के वगैर भोजन में दिक्कत है तब आप भोजन के बीच में एक बार पानी
पीना भी उचित है भोजन के बाद कभी नहीं ।।
- 80
प्रकार के रोग चाय पीने से होते हैं ।।
- 48 प्रकार
के रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं ।।
108 प्रकार के रोग मांस खाने से होते हैं ।।
- शराब, कोल्डड्रिंक
और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है ।।
- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी
और गुर्दे खराब होते हैं ।।
- ठंडे जल {फ्रिज}
आइसक्रीम से बड़ी आंत सिकुड़ जाती है ।।
- मैगी,
गुटका, शराब, पिज्जा, बर्गर,
बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी,
कोक से बड़ी आंत सड़ती है ।।
11-- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति
मन्द हो जाती है, और शरीर कमजोर हो जाता है ।।
- बाल रंगने वाले द्रव्यों हेयरकलर से आँखों को
हानि पहुंचती है {अंधापन
भी} हो सकता है ।।
13-- दूध, चाय के
साथ नमक {नमकीन पदार्थ}खाने से चर्म रोग हो जाता है, फटे
हुये दूध न खायें,
पनीर खाने के फैशन से बचें ।।
-
शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के सुगंधित तेलों से
बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं ।।
- गर्म जल से स्नान करने पर, शरीर
की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है, गर्म
जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं ।
- टाई बांधने से आँखों और मस्तिष्कश को हानि
पहुँचती है ।।
- खड़े होकर जल पीने से घुटनों {जोड़ों}
में पीड़ा होती है,
- खड़े होकर मूत्र-त्याग करने से रीढ़ की हड्डी
कमजोर होती है ।।
भोजन बन जाने के बाद उसमें नमक डालने से,
रक्तचाप {ब्लडप्रेशर} बढ़ता है
।।
मुँह से साँस लेने वालों की आयु कम होती है,
कुत्ते इसके उदाहरण हैं ।।
- अधिक झुककर पढ़ने से या झुककर कोई काम करने से,
फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षयरोग {टीबी}
होने की समभावना होती है ।।
- नीम
के पत्ते से अक्सर मुख तीता कर लेना चाहिए, चैत्र
माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है ।।
- नित्य तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता ।।
- मूली प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से
मुक्त रहता है सायंकाल मूली खाने से बचें ।।
- अनार - आंव, संग्रहणी,
पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ फल है ।।
- हृदय-रोगी के लिए अर्जुन की छाल, लौकी
का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी,
सेंधा नमक, गुड़, - चोकर-युक्त
आटा, छिलके-युक्त अनाज औषधियां हैं ।।
- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या
सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है ।। अपच नहीं होता है ।।
ध्यान रहे- पान इलायची सुपारी चूना, मुलेठी
ही एकसाथ लें तम्बाकू नही।।
- कफ दूर करने के लिए, मुलहठी
चूसें, इससे आवाज मधुर होती है ।।
- जल सदैव ताजा पीना चाहिये, बोतलबंद
फ्रिजका पानी, आर ओ का पानी, बासी
पानी अनेक रोगों के कारण होते हैं हां
मटके का पानी पीना लाभकारी है।।
- फल, मीठा और घी या
तेल से बने पदार्थ खाने से पहले जल - पीकर प्यास बुझायें, बाद में
जल पीने से बचें ।।
- भोजन बनने के एक घंटे के भीतर अवश्य खालें ।।
भोजन बनाने हेतु एक नं. मिट्टी के बर्तन,
दो नं. कांसे के बर्तन तीन नं. पीतल के बर्तन हैं ।। सम्भव हो तो,अल्युमिनियम
के बर्तन और प्रेशर कुकर से बचें ।।
- स्वास्थ्य हेतु 15 दिन तक गेहूँ का आटा,
और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का
का आटा 7 दिनों से अधिक हो तो प्रयोग न करें ।। आटा मोटा ही पिसवाएं चोकर सहित
खाने का आनंद ही कुछ और है ।।
- किसी भी उम्र के लोगों को मैदा {बिस्कुट,
बे्रड, समोसा आदि} कभी भी
नहीं खिलाएं ।।
- भोजन में सेंधा नमक सर्वश्रेष्ठ होता है, उसके बाद
काला नमक का स्थान आता है, सफेद नमक जहर समान है ।।
- शरीर, जल जाने
पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी
में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है, फफोले
नहीं पड़ते ।।
- सरसों, तिल,
मूंगफली या नारियल का तेल
देशी घी ही खायें, रिफाइंड तेल और वनस्पति घी {डालडा}
जहर समान है ।।
पैर के अंगूठे के नाखूनों में सरसों तेल से
भिगोने से आँखों की खुजली, लाली और जलन ठीक हो जाती है ।।
- प्रति दिन गेहूं के दाने के बराबर खाने का
चूना को खाने से अनेक रोग ठीक होते हैं ।।
- चोट,
सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा
होने पर, बरसाती कागज मे लपेटकर लगभग 20 मिनट तक घावपर चुम्बक रखने से जल्दी
ठीक होता है ।। हड्डी टूटने पर भी चुम्बक का लाभ लें ।।
- मीठे में
चीनी की जगह , गुड़, शहद, शक्कर खांड{गुड़ का बूरा}
प्रयोग करें ।।
-सप्ताह मे नीम के दातून अवश्य करना चाहिए ।।
सूर्यास्त के पश्चात् लिखना, पढ़ना
से अच्छा है, ब्रह्म मुहूर्त मे जगकर अध्ययन करना ।।
नाभी मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है नाभी
रात को सोते समय में देशी गाय का घी लगाने
से आंखों की रोशनी बढ़ती है नाभी में सरसों का तेल लगाने से सिर का दर्द ठीक होता
है बाल सफेद नहीं होते नाभी में नारियल का तेल लगाने से चेहरे पर ग्लो आता है किल
मुंहासे नहीं निकलते मौसमी सुखी खाज खारीस ठीक होती है नाभी में अरंडी का तेल
लगाने से जोड़ों के दर्द को आराम मिलता है नाभी में महुआ का तेल लगाने से वात दर्द को आराम मिलता है नाभी में हींग का
तेल लगाने से पेट का दर्द ठीक होता है।।
-
निरोग रहने के लिए ताजा भोजन तथा 6से8,
घंटा नींद अति आवश्यक है ।।
- देर रात तक जागने से शरीर की प्रतिरोधक
क्षमता कमजोर हो जाती है, भोजन का पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता,
आँखों मे रोग उत्पन्न होते हैं ।।
-
प्रातः का भोजन पूरा , दोपहर मे थोड़ा कम, और
रात्रि मे सोने से दो घंटे पहले, अल्प भोजन लें ।।
विश्वास के साथ प्रकृति से जुड़कर योग और प्राणायाम यम और नियम मौसम के अनुसार
भोजन विरुद्ध आहार का त्याग कर आप स्वस्थ रहेंगे ।।
यह पोस्ट आयुर्वेद और आहार विज्ञान पर आधारित
सामान्य जानकारी उपलब्ध कराती है किसी भी चिकित्सा अथवा आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह
अथवा चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
14/07/2024, 7:29 pm
- Yashpal S Barampur: *आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
*आचार्य चाणक्य(कौटिल्य) अर्थ शास्त्र राजनीति
शास्त्र युद्ध विद्या के ही विद्वान नहीं थे अपितु आयुर्वेद के भी आदित्य और अदभुत
विद्वान थे।
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प्राचीन भारत के महान रणनीतिकार #आचार्य_चाणक्य
अपने साथ एक दण्ड लेकर चला करते थे। कहा जाता है कि आचार्य चाणक्य अपने दण्ड में #गुडूची
छुपाकर रखते थे ताकि संकट के समय उनकी प्राण रक्षा हो सके। आयुर्वेद की संहिताओं
मे दण्ड को भय का नष्ट करने वाला बताया गया है (सु.चि. 24.78, च.सू.5.102)
भयघ्नं दण्डधारणम्। लेकिन हम डंडे की बात कभी बाद में करेंगे, आज
की चर्चा उस गुडूची पर है जिसे आचार्य चाणक्य अपने डंडे में सदैव रखते थे और जिनका
मानना था कि औषधियों में गुडूची सर्वश्रेष्ठ है (बृ.चा.9.4): सर्वौषधीनां अमृता
प्रधाना। गुडूची को आब-ए-हयात नाम से भी जाना जाता है।आम बोलचाल में इसे #गिलोय
भी कहा जाता है
आइये, सबसे पहले
आयुर्वेद की संहिताओं में उपलब्ध जानकारी की बात करते हैं। उम्र को रोके रहने वाले
या वयःस्थापक द्रव्यों में गुडूची शामिल है। इस वर्ग की अन्य प्रजातियाँ #हरीतकी,
#आँवला, रास्ना, अपराजिता,
जीवन्ती, अतिरसा #शतावरी,
#मंडूकपर्णी, #शालपर्णी, व #पुनर्नवा
हैं (च.सू.4.18):
अमृताऽभयाधात्रीमुक्ताश्वेताजीवन्त्यतिरसामण्डूकपर्णीस्थिरापुनर्नवा इति दशेमानि
वयःस्थापनानि भवन्ति। इसके अतिरिक्त एकल या अकेली गुडूची का भी अनेक बीमारियों के
विरुद्ध प्रयोग किया जाता है। आचार्य भावमिश्र ने स्पष्ट किया है कि (भा.प्र.पू.ख.
गुडुच्यादिवर्ग 6.8-10): गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी। संग्राहिणी
कषायोष्णा लघ्वी बल्याऽग्निदीपिनी।। दोष त्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम्।
कामला कुष्ठवातास्त्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत।। प्रमेहश्वासकासार्शः
कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत् ।
आयुर्वेद की प्रमुख संहिताओं में 178 ऐसे
जीवनदायी योग हैं जिनमें गुडूची प्रमुखता से प्रयुक्त होती है और शायद ही ऐसा कोई
रोग हो जो इन योगों से न सम्हलता हो। गुडूची के मिश्रण वाले योगों का उपयोग #टाइफाइड,
नर्वस सिस्टम के रोग, तमाम तरह के टॉक्सिक और सेप्टिक बुखार,
वातज, पित्तज और कफज ज्वर, रक्तस्राव,
गठिया, गाउट, रूमेटिज्म,
ऐसे बुखार जिनमें प्राय रक्त स्राव हो जाता है, उल्टी,
जलन, दाह, मोटापा, अम्ल
और पित्त बढ़ने के कारण होने वाली उल्टियां, चमड़ी के
अनेक तरह के रोग, अल्सर, शोथ, मलेरिया,
यूरिनरी ट्रैक्ट से जुड़े रोग, फाइलेरियासिस,
एंजाइना और वातज शूल, पित्तश्लेष्मिक ज्वर, वृष्य
और वाजीकरण, याददाश्त बढ़ाना, आंखों और
आंख से जुड़े तमाम रोग, उम्र बढ़ने को रोकना, बालों का
पकना रोकना, बौद्धिक क्षमता बढ़ाना, शरीर का
नवीनीकरण करना, फिस्टुला इन एनो सहित गुदा के तमाम रोग,
अनेक प्रकार के कुष्ठ, ज्वाइंडिस, राइनाइटिस,
साइनस, स्प्लीन का बढ़ना, जोड़ों
का दर्द, ट्यूमर, एनीमिया, प्लीहा
का बढ़ना, अग्नि को सम करना, बलवृद्धि, मनोविभ्रम
की स्थिति ठीक करना, मिर्गी, तमाम वात
विकार, जननांगों से जुड़ी हुई समस्यायें, सर्वाइकल
लिम्फोडिनोमा, योनि-रोग ठीक करना, दीर्घायु-प्राप्ति,
शरीर को कांतिवान बनाना, सियाटिका सहित
कमर, पैरों और जांघों का दर्द, डिसपेप्सिया,
सिरदर्द, माइग्रेन, दांत का
दर्द जैसे अनेक रोगों को ठीक करने में होता है।
आयुर्वेद की #एंटीवायरल
औषधियां, जिनमें गुडूची भी शामिल है, पर इन वाइवो,
इन वाइट्रो, और क्लिनिकल अध्ययन हो चुके हैं।ये
तमाम प्रकार के वायरल रोगों से बचे रहने के लिये मददगार हैं। कालमेघ, चिरायता,
तुलसी, शुंठी, वासा, शिग्रू
या सहजन, कालीमिर्च, पिप्पली, गुडूची,
हरिद्रा, यष्टिमधु, बिभीतकी,
आमलकी, अश्वगंधा, हरीतकी,
मुस्ता, पाठा, पुनर्नवा,
लहसुन, शरपुन्खा, कुटज,
शल्लकी, #पुदीना, #त्रिकटु,
#त्रिफला आदि शोध में एंटीवायरल सिद्ध हो चुके हैं| इसके
साथ ही संहिताओं, साइंस और अनुभव को साथ लेकर आधुनिक वैज्ञानिक
विधियों से निर्मित जेवीएन-7 (अग्नि सम रखने हेतु) जेरलाइफ-एम व जेरलाइफ-डब्ल्यू
(व्याधिक्षमत्व बढ़ने हेतु), कोल्डकैल, एलेरकैल,
त्विषामृत (हेतु-विपरीत एंटीवायरल) जैसी डबल-स्टैंडर्डाइज़्ड
मल्टीस्पेक्ट्रम आयुर्वेदिक रसायन व औषधियाँ वायरल संक्रमण से बचाव और उपचार दोनों
ही उत्तम परिणाम देती हैं। इन तमाम योगों में भी गुडूची प्रमुखता से प्रयुक्त होती
है। लेकिन यहाँ सेल्फ-मेडिकेशन बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिये। केवल वैद्यों की
सलाह से ही औषधि लेना उपयुक्त और सुरक्षित होता है।
इसके अलावा अनेक शोध और भी हैं जिनमें गुडूची
को उपयोगी पाया गया है। कुछ उदाहरण देखते हैं। कम मात्रा में भी दारू पीने से
पुरुषों में सेक्स हार्मोन को होने वाले नुकसान को रोकने में आयुर्वेदिक औषधि
गुडूची सहायक है। दारू पीने से बर्बाद मेटाबोलिज्म को ठीक करने में गुडूची सहायक
हो सकती है। यकृत को भी ठीक करती है।लेकिन इस जानकारी का उपयोग पियक्कड़ हो जाने के
लिये न करें। गुडूची द्वारा बीटा-सेल्स के रिजेनेरेशन की संभावना भी पायी है।
डायबिटीज के उपचार की दिशा में एक और प्रमाण यह है कि गुडूची पैन्क्रेआटिक बीटा
सेल्स का संरक्षण कर ग्लूकोज चयापचय को नियंत्रित करती है। शुंठी व गुडूची के
संयोजन से बना योग 16 प्रकार के जींस व 27 प्रकार के कैन्सर्स को विनियमित करता
है। कंकालीय-मांसपेशी से संबंधित विकार आज एक बड़ी समस्या है जो केचेक्सिया,
सारकोपीनिया व इम्मोबिलाइजेशन के कारण उत्पन्न होती है। इस समस्या को
हल करने में गुडूची उपयोगी पायी गयी है।बच्चों को रोज रोज के इन्फेक्शन से छुटकारा
मिल सकता है क्योंकि गुडूची बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। क्लिनिकल
ट्रायल में आमलकी व गुडूची मुख-कैंसर के उपचार में लाभकारी पायी गयीं हैं। गुडूची
में क्लिनिकल ट्रायल से यह भी ज्ञात होता है कि यह एलर्जिक रायनाइटिस, जुकाम,
बुखार ठीक करने और व्याधिक्षमत्व बढ़ाने में उपयोगी है।
दरअसल, उपरोक्त वर्णन
से स्पष्ट है कि गुडूची के बारे में उपलब्ध प्रमाणों को तीन तरह से देखा जा सकता है|
एक तरफ स्थानीय आदिवासियों द्वारा स्थानीय ज्ञान का प्रयोग कर
विभिन्न प्रकार के रोगों के विरुद्ध गुडुची का प्रयोग पूरे देश में वैज्ञानिकों और
शोधकर्ताओं द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। दूसरी तरफ आयुर्वेद की संहिताओं में
गुडूची को विभिन्न रोगों के विरुद्ध प्रभावी होने की जानकारी अंकित है।इसके साथ ही
आधुनिक वैज्ञानिक शोध की विधियों - इन वाइट्रो, इन वाइवो
एवं क्लिनिकल ट्रायल्स – में भी गुडूची की विभिन्न रोगों के
विरुद्ध क्रियात्मकता सिद्ध हुई है।
यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि इतना
सब कुछ उपलब्ध होते हुये भी गुडूची जिन रोगों में उपयोगी है उनके लिये इसे
निर्विवाद औषधि मानने में क्या समस्यायें हैं? दरअसल,
आधुनिक वैज्ञानिक शोध की विधियां केवल रेंडमाइज्ड ट्रायल्स को ही
गोल्ड क्लास शोध का दर्जा देती हैं। त्रुटिवश आयुर्वेद के लिये भी यह धारणा बन गयी
है कि क्लिनिकल ट्रायल्स के बिना आयुर्वेद की किसी औषधि को रोगों के विरुद्ध एक
प्रभावी और उपयोगी औषधि के रूप में मान्यता नहीं मिल सकती। लेकिन कटु सत्य यह है
कि आधुनिक वैज्ञानिक शोध की विधियां जिनमें रेंडमाइज्ड क्लीनिकल ट्रायल शामिल हैं,
आयुर्वेद की समग्रता को साथ लेकर नहीं किये जाते| उदाहरण
के लिये, आयुर्वेद में केवल औषधि महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि निदानपरिवर्जन,
पथ्य-अपथ्य, व्यक्ति की प्रकृति आदि अनेक
महत्वपूर्ण कारक हैं जिन्हें देखते हुए किसी औषधि विशेष की, किसी
व्यक्ति विशेष में, किसी रोग विशेष के विरुद्ध प्रभाविता आंकी जा
सकती है। इस प्रकार के क्लिनिकल ट्रायल्स को ही आयुर्वेद के लिये उपयोगी माना जा
सकता है| होल-सिस्टम क्लिनिकल ट्रायल के बिना आयुर्वेद की किसी औषधि की
प्रभाविता जांचना और परखना संभव नहीं है।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यदि ज्ञान के
उत्पादन की सभी विधियां एक ही दिशा में संकेत करती हैं तो ऐसे प्रमाण को आप
निर्विवाद प्रमाण मान सकते हैं, जब तक कि ऐसे प्रमाण के विरुद्ध कोई
अन्य अध्ययन ऐसे प्रमाण को रद्द न करता हो। यहां पर पारंपरिक वनस्पति विज्ञान,
आयुर्वेद, वैद्यों के अनुभव और आधुनिक शोध को साथ में
देखने पर गुडूची को उपयोगी औषधि मानने के उचित, पर्याप्त
और निर्विवाद प्रमाण उपलब्ध हैं।
ऐसा नहीं है कि जिन औषधीय पौधों में विभिन्न
स्तरों पर आधुनिक वैज्ञानिक शोध हो चुकी है वे अंततः क्लिनिकल ट्रायल में भी उस
रोग के विरुद्ध उपयोगी पाये जायेंगे। एलोपैथी की दवाओं समेत किसी भी औषधि के लिये
ऐसी कोई सुनिश्चितता विज्ञान में उपलब्ध नहीं है। परन्तु उन औषधीय पौधों में
जिनमें आयुर्वेद की संहिताओं में स्पष्ट जानकारी अंकित हैं वे वस्तुतः दीर्घकाल तक
आयुर्वेद आचार्यों के अनुभवजन्य ज्ञान के आधार पर ही अंकित की गयी है| पिछले
5000 वर्षों के दौरान अलग-अलग काल में लिखी गई संहितायें जब एक ही दिशा में संकेत
करती हैं तो यह माना जा सकता है कि जिन विद्वानों ने उन्हें लिखा उन्होंने अपने
अनुभवजन्य ज्ञान के आधार पर उसका पुनः परीक्षण और पुनः पुष्टि की। इसलिये आधुनिक
वैज्ञानिक शोध अपनी जगह ठीक है और वह चलना भी चाहिये लेकिन 2000 साल तक निरंतर
उपयोग के द्वारा उत्पन्न अनुभवजन्य ज्ञान को आज सिर्फ इस आधार पर नहीं नकारा जा
सकता कि उनमें तथाकथित क्लिनिकल ट्रायल्स उपलब्ध नहीं हैं।
अंत में यही कहना है कि ऐसे उपयोगी पौधे को
हमारे आसपास अवश्य लगना चाहिये। पौधे उगाने की सबसे अनुपजाऊ जगह मानव का दिमाग है।
इंसान के माथे में पौधा लगाना बहुत कठिन है, मिट्टी
में लगाना तो आसान रास्ताहै। आप भी आगे आइये और गुडूची सहित अपने लिये उपयोगी
औषधीय पौधों का अधिक से अधिक रोपण कीजिये इससे प्रकृति का भी भला होगा और मानव का
भी।जरूरत पड़ने पर औषधियों के लिए दर-दर
नहीं भटकना पड़ेगा।
धन्यवाद
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
15/07/2024, 6:04 am
- Yashpal S Barampur: (३०)
आहार विज्ञान भाग-४
**आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
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*मानव आहार हजारों वर्षों से शोध का विषय रहा
है जितना शोध और खोज इस विषय पर हुई है किसी और विषय पर नहीं हुई । वास्तव में
हमारे स्वास्थ्य का संबंध हमारे खान-पान से है मानव को होने वाले 99%रोग का संबंध
हमारे आहार से ही है आयुर्वेद में भी आहार के विषय में एक अलग विज्ञान है जानते
हैं आहार के विषय में क्या कहता है आयुर्वेद।
*आयुर्वेद के विद्वानों ऋषियों ने हजारों वर्षों के शोध औरअनुभव से जो
जाना है वहीं भारतीय आहार विज्ञान है जिसे आधार बनाकर ही आधुनिक रिसर्च हो रही है।
भोतिक संसाधन तभी किसी व्यक्ति के लिए उपयोगी है वह उन का भोग करसकता हो- जब वह स्वस्थ
हो बीमार के लिए सभी निरर्थक और बेकार हैं स्वास्थ का संबंध हमारे आहार से है आहार
विज्ञान स्वस्थ .बलिष्ठ रोग रहितशरीर तथा
विचार शील रचनात्मक तेज स्मरण शक्ति नवीन उत्साहऔरउर्जा को प्राप्त करने के लिये
बनाये रखने के लियेआहार विज्ञान का ज्ञानहोना अतिआवश्यक है ।आहार पथ्य परहेज
परआयूर्वेद विशेष जोर देता है और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान पथ्य और परहेज को निर्थक
मानता है आहार विज्ञान को समझने के लिये इन तीन शब्दो का अर्थ समझ ना तथा उस का
पालन करनाआवश्यक है।
हितभुक_,मितभुक_,रितभुक
हितभुक.यानि वह खाद्य पदार्थ जो हमारे मानव
शरीर
के
लिये हितकारी हों सुपाच्य हो आप की प्रकृति के अनुकूल हो निर्रथक चर्बी मांस
मजजा मधुमेह न बढ़ायें अधिक नमक ना हो प्रोटीन संतुलित हो वात पित कफ
का संतुलन बनाये रक्खे बिगाडे नहीं जिसमें रस प्रधान हो अधिक ऐसीटिक
(अमलिय) ना हो क्षारीय हो आवश्यक पोषक तत्व विटामिन्स मिनरल्स प्रोटीन्स खनिज भोजन
में विद्यमान हों|
ऐसा आहार स्वस्थ और निरोग रखता है।
मितभुक..यानि मर्यादित खाना मिठा अधिक
खाने से शुगर नमक अधिकखाने से हर्दय
त्वचा रोग आदि शीतल पेय के पीने से गठीया
जोडो में दर्द तिक्त चरपरा खाने से आमाश्य
के रोग चर्बी युक्त चिकने पदार्थ से धमनियों
तथा दिल के रोग हो जाते हैं|कहने
का अभिप्राय यह है
किसी
भी खाद्य पदार्थ का मर्यादा से अधिक सेवन विष
का काम करता है चाहे वह कितना स्वादिष्ट व शरीर
के लिये अमृत ही क्यों ना हो ।
ऋत
भुक यानिऋतू अनुसार भोजन करना
हम मानसूनी प्रदेश में निवास करते हैं योरोप
तथा विषवत प्रदेश की तरह भोजन करना हमारे स्वस्थ पर विपरित प्रभाव डालता है
प्रतिएक मौसम मे पैदा होने वाले फल सब्जी प्रकृति का वरदान है तथा सेवन स्वस्थ
रहने की गारंटी देता है जैसे खीरा ककड़ी
तरबूज खरबूजा लौकी शुषक ऋतु में पैदा होता है जब हमें तरल यानी पानी की
हमारे शरीर को स्वस्थ रहने के लिएआवश्यकता अधिक होती है खाना लाभकारी है तथा- यही
सब्जी और फल यदि वर्षा ऋतु में खाते जाते हैं तो स्वास्थ्य के लिए हानी कारक हैं
बर्षा ऋतु में वातावरण में नमी की मात्रा अधिक होने के कारणयह पाचक तन्त्र को कमजोर करते है वात पित को बढाते
है अनेक रोग होने का कारण बन सकता है यही सब्जी और बेल कुल के फल यदि शीत ऋतु
में खाये जाते हैं तब यह कफ तथा वात को
बढाकर रोगों को निमंत्र देता है यह एक उदाहरण है इसी प्रकार जिस ऋतु में जो भी फल
सब्जी पैदा होती हैं उसीऋतु में उनका भरपूर उपयोग करना चाहिये विपरीत ऋतु में सेवन
स्वास्थ को लाभ से अधिक हानी पहुंचाहता है चाहे वह कितना भी स्वादिष्ट और पोषटिकता
से परिपूर्ण क्यों ना हो।
कहने का अभिप्राय यह है आयूर्वेद के हित भुक ,मित
भुक,ऋत भुक के सिधांत को अपना कर 99प्रतिश्त रोगों से बचा जा सक्ता है आप
के शारीरिक तथा मानसिक रोगों से बचाव का राज खाने की थाली में छिपा है ।
यह पोस्ट आयुर्वेद पर आधारित सामान्य जानकारी
उपलब्ध कराती है किसी भी चिकित्सा अथवा आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अथवा चिकित्सा
का विकल्प नहीं है।
यशपाल सिंह आयूर्वेद रत्न
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