*दिन चर्या*
*संस्कृत में दैनिक कार्यकम को दिनचर्या कहते हैं| दिन का अर्थ है दिन का समय और चर्या का अर्थ है उसका पालन करना या उसके निकट रहना| दिनचर्या आदर्श दैनिक कार्यक्रम है जो प्रकृति के चक्र का ध्यान रखती है| आयुर्वेद प्रातः काल के समय पर केंद्रित होता है क्योंकि वह पूरे दिन को नियमित करने में महत्वपूर्ण है|
*--------------------------------*
*आयुर्वेद यह मानता है कि दिनचर्या शरीर और मन
का अनुशासन है और इससे प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है और मल पदार्थो से शरीर
शुद्ध होता है| सरल स्वस्थ दिनचर्या से शरीर और मन शुद्ध होते
हैं, दोष संतुलित होते हैं, प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है और दिन
की शरुआत ताज़गी और पुनार्युवन से होती है|
*प्रातः काल में सरल दिनचर्या का पालन करने से
आप की दिन की शुरुआत आनंदमय होती है| आपकी सुबह ताज़गीमय होने के लिये यह
मार्गदर्शिका है |
*ब्रह्म मुहूर्त।
*सूर्योदय से डेढ़ घंटे पूर्व के काल को ब्रह्म
मुहूर्त या ब्रह्म काल कहते हैं इस समय उठने से आप सूर्य की लय के साथ समकालिक हो
सकते हैं | आयुर्वेद ब्रह्म मुहूर्त की अनुशंसा करता है
जिसका अर्थ है ब्रह्म का समय या शुद्ध चेतना या शुभ और प्रातः काल के इस समय उठना
सर्वश्रेष्ठ माना गया है|
*सूर्योदय से देड घंटे पूर्व वातावरण में विशाल
ऊर्जा की गति भर जाती है और रात्रि में ओस के पढ़ने से वायु शुद्ध हो जाती है शहरी
क्षेत्रों में जहां वायु प्रदुषण अधिक है वहां
दिन की अपेक्षा कम प्रदुषित रहती है | फिर
सूर्योदय के आधे घंटे पूर्व दूसरी ऊर्जा की धूम वातावरण में भोर करती है| आशा,
प्रेरणा और शांति इस समय प्रकट होती है| यह समय
ब्रह्म ज्ञान (ध्यान और स्वाध्याय ), सर्वोच्च ज्ञान और शाश्वत सुख प्राप्त
करने के लिये सर्वश्रेष्ठ माना जाता है| इस समय वातावरण
शुद्ध,शांत और सुखदायक होता है और निद्रा के उपरांत मन में ताज़गी होती है|
*इस समय ध्यान करने से मानसिक कृत्य में सुधार
होता है| यह सत्वगुण बढ़ाने में सहायक है और रजोगुण और तमोगुण से मिलने वाली
मानसिक चिडचिडाहट या अति सक्रियता और सुस्ती से निदान देता है ।
(मेरे पास बहुत व्यक्ति 35से 45, वर्ष
आयु वर्ग के सलाह के लिए आते हैं जिनका बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा होता LDL 63.0
-129 .जो सामान्य मानक के सापेक्ष 200या इससे भी अधिक होगया हैऔर टोटल कोलेस्ट्रॉल
सामान्य मानक 4.97के सापेक्ष 7.0तक हो गया है ह्रदय गति ठीक है वजन अधिक है दिन
चर्या अव्यवस्थित है शारीरिक श्रम शुन्य
है ऐसी का प्रयोग अधिक करते हैं बात करने पर बताते हैं हमारे पास समय नहीं है आज
के व्यक्ति कि सोच विडंबना देखिए जिस जीवन को सुखमय बनाने के लिए व्यक्ति मेहनत
कररहा है उस शरीर के स्वस्थ रखने के लिए उसके पास समय नहीं है मेरी उन्हें सलाह
होती है सुखी जीवन की कल्पना बिना स्वस्थ शरीर के बेमानी है इसलिए अपनी व्यस्त
दिनचर्या से कुछ समय अपने शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अवश्य निकालें वह प्रांत सूरज निकलने से डेढ़ घंटा पूर्व अपना
बिस्तर छोड़ दें और ठंडे पानीजो साम को तांबे के पात्र में भरकर रखा था पीलें उसके बाद शौच आदि से निवृत होकर सड़क पर या पास
में कोई पार्क हो वहां पैदल कमसे कम 8से10किलो मीटर चलें चलने की गती10-12मीनट में
2किलो मीटर हो या गती इतना हो जो पसीना निकल जाते इससे कैलोरी बर्न होंगी LDLका
स्तर घटेगा ह्रदय फेफड़े यकृत गुर्दे को शक्ति मिलती है हाजमा ठीक र था है कुछ दिन
के अभ्यास के बाद आप स्वयं महसूस करने लगोगे वजन घटने लगा है अनावश्यक चर्बी
पिघलने लगी है शरीर की चुस्ती फुर्ती लौट आती है आज के समय में जब शारीरीक मेहनत
तक होगयी है आवश्यक है अपने लिए शरीर को स्वस्थ और चुस्त दुरुस्त रखने के लिए
शारीरिक गतिविधियों को वढाना वह भी पैदल चलनाआज के समय में यह व्यायाम का बेतर
विकल्प है यदि आप ऐसा नहीं कर रहे हैं तब आप का सुखमय जीवन के लिए किते गये सभी
प्रयास बे मायने और निरर्थक ही है पौराणिक कहावत भी है पहला सुख निरोगी काया दूसरा
सुख घर में हो माता तीसरा सुख पुत्र आज्ञाकारी चौथा सुख सहयोगी नारी(पत्नी) सुख की अनुभूति बिना शरीर को स्वस्थ रक्खे होही
नहीं सकती मेरे सुझाव को मान कर हजारों व्यक्तियों ने अपने जीवन को स्वस्थ होकर
ह्रदय रोग और निर्थक दवाओं के सेवन से निजात पाली
|)
*श्वास की शक्ति |Power of Breath
*यह देखे कि कौनसी नासिका से श्वास का प्रवाह
अधिक है| आयुर्वेद के अनुसार दाहिनी नासिका सूर्य पित्त है और बाईं नासिका
चंद्र पित्त है| मस्तिष्क का दाहिना भाग रचनात्मक कार्यों को
नियंत्रित करता है और बायां हिस्सा तार्किक और मौखिक कृत्यों को नियंत्रित करता है|
शोध के अनुसार जब कोई बाईं नासिका से श्वास लेता है तो मस्तिष्क का
दाहिना भाग अधिक हावी होता है और इसका विपरीत भी|
*सकारात्मक तरंगे |Positive Vibrations
प्राचीन परंपरा का पालन करते हुये अपने हथेली
की रेखाओं को देखे और धन, ज्ञान और शक्ति की देवियों को याद करे|
उंगलियों के ऊपर के भाग को अंगूठे से गोलाकार सुखदायक लय में घिसे –
दाहिना दक्षिणावर्त गोलाकार और बायां वामावर्त गोलाकार लय में|
हथेली को उंगली के ऊपर के भाग से घिसे और दाहिनी कलाई को दक्षिणावर्त
लय में घुमाये और बायीं कलाई को वामावर्त लय में घुमाये| शरीर के
जिस भाग में श्वास का प्रवाह अधिक हो पहले उस भाग की हथेली को चूमे और फिर दूसरी
हथेली को चूमे| (चुंबन ऊर्जा प्रदान करती है| अपनी
हथेली को चूमने से आप अपने सबसे प्रभावकारी शस्त्र आत्म अभिव्यक्ति को उत्तम कंपन
प्रदान करते हैं|) अपने दोनों हाथों को घिसे फिर दोनों हथेली को
धीरे धीरे चेहरे, सिर,कंधे,हाथ
और पैरों की ओर ले जाये जिससे ऊर्जा का एक कवच निर्मित हो जाता है और पूरे दिन
नकारात्मक प्रभाव से संरक्षण मिलता है|
*रक्षा मंत्र |Protection Mantra
*रक्षा मंत्र का मंत्रोचारण करे जो इस सरल
लेकिन प्रभावकारी सुबह की दिनचर्या का हिस्सा है| मंत्रोचारण
के उपरांत कुछ क्षण शांत और खाली मन के साथ बैठे|
*कर अग्रे वसते लक्ष्मी
(हाथों के आगे भाग में अर्थात उंगली के ऊपर के
भाग में धन की देवी लक्ष्मीजी का वास होता है|)
*कर मध्ये च सरस्वती
(हाथ में मध्य भाग में अर्थात हथेलियों में कला
और ज्ञान की देवी सरस्वती का वास होता है|)
*कर मुले वसते गोविंदम
(हाथ के आखिर के भाग में अर्थात मूल या कलाई
में भगवान श्रीकृष्ण का वास होता है|)
*प्रभाते शुभ कर दर्शनम
(सुबह हाथों को देखना शुभ होता है|)
*सकारात्मक कदम |Positive Step
बिस्तर छोड़ते समय नासिका के जिस भाग में श्वास
का प्रवाह तेज या हावी हो उस भाग के पैर को जमीन पर पहले रखे|
*सफाई |Clean Up
*ठंडे पानी से कुल्ला कर ले| जल
विद्युत कंडक्टर होता है और संवेदनशील ऊतकों में कभी भी जलन पैदा नहीं कर सकता|
ठंडे पानी से हाथ,चेहरा ,मुंह और
आँखों को धो ले| नाक,दांत और जीभ को
साफ कर ले|
*ध्यान और व्यायाम |Meditate and
Exercise
*विश्राम से – प्राणायाम
तब तक करे जब तक दोनों नासिकाओं से श्वास बराबरी से प्रवाहित होना शुरू हो जाये|
अपनी ऊर्जा को ह्रदय के चक्र या तीसरी आँख की ओर केंद्रित करके ध्यान
करे| छोटी और धीमी गति से सुबह की ताज़ी हवा में चले|अपने आप
को सरल और सुखदायक दृश्यों में घेर ले खास तौर सफेद वस्तुओं जैसे ताज़े और सुगंधदार
फूल जिनके सूक्ष्म रंग हो|
*व्यायाम या शारीरक कसरत में सामान्यता कुछ योग
मुद्रायें होती है जैसे सूर्यनमस्कार और श्वास प्रक्रियायें जैसे नाड़ीशोधन
प्राणायाम| लेकिन इसमें सैर करना और तैरना भी सम्मलित हो
सकता है| सुबह के व्यायाम से शरीर और मन की अकर्मण्यता समाप्त होती है,
पाचन अग्नि मजबूत होती है, वसा में कमी आती
है| आपके शरीर में अच्छे प्राण की वृद्धि हो जाने से आपको हल्केपन और
आनंद की अनुभूति होती है| घोर परिश्रम वाले व्यायाम की तुलना में
आपकी १/४ या १/२ क्षमता के अनुसार ही व्यायाम करने की अनुशंसा की जाती है|
*अपने आप की देखरेख करे |Pamper
Yourself
*अपने शरीर की तिल के तेल से मालिश करे
(अभ्यंग)| खोपड़ी, कनपटी, हाथ और पैर की
२-३ मिनिट की मालिश पर्याप्त है|
*ठीक से स्नान करे |Bathe Right
*ऐसे पानी से स्नान करे जो न तो ज्यादा गर्म या
ठंडा हो।
* बाल आहार कलेवा (नास्ता)सुबह का
नाश्ता यह तय करता है की आपकी पूरे दिन मनो स्थिति क्या रहने वाली है सुबह खाली पेट कुछ चीजें नहीं खानी चाहिएं
*1केला खाली पेट केला खाने से शरीर में
मैग्निशियम का स्तर बढ़ जाता है जो ह्रदय को सही से काम करने को प्रभावित करता है
।
*2, मिर्च मसाले दार
आहार खाली पेट खाने से एसिड बढ़ता है और आमाशय में जलन होने लगती है
*3 , खट्टे फल खट्टे फलों में फ्रूट एसिड फाइबर शुक्रोज होता है जो पाचनशक्ति को
मंद करताहै।
*4,चाय या काफी में
कैफ़ीन होता है जो खाली पेट लेने से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल बढ़ता है।
*5, मिठाइयां और
चाकलेट खाली पेट खाने से एसिडिटी होती है
*6, शराब खाली पेट
पीने से लीवर किड़नी डिजीज होता है।
*7,साफटडरिंकक खाली
पेट कभी नालें जान लेवा हो सकती है
*8, लीची अभी पिछले
वर्ष बिहार में बच्चों की मौत हुई थी जांच में पता चला जिन बच्चों ने खाली पेट
लीची खाई थी उन की मौत हुई रात में पेट में हाइड्रोक्लोरिक एसिड बनता है जिस के
साथ मिलकर लीची विष बनाती है।
*9,खाली पेट दही
नहीं खानी चाहिए खाली पेट जो पेट में जो हाइड्रोक्लोरिक एसिड बनता है वह
दही के गुड बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है इसलिए ख़ाली पेट दही खाने का कोई मतलब
नहीं।
*10
हरी सब्जियों का,सलाद हरी सब्जियों में एमिनो एसिड होता है जो
ख़ाली पेट पेट में बन रहे हाइड्रोक्लोरिक एसिड में मिल कर ब्लड यूरिया को बढ़ाते
हैं।
*क्या खायें
अंकुरित अनाज हर्बल चाय भिगे चने ग्रीन टी मिटे फल फिका दुध छाछ एक चम्मच
शहद नमक अजवायन की गेहूं चना जौ मिली रोटी
*दोपहर का समय |Noon - Time
*दोपहर का भोजन १२ से १ बजे के बीच करना चाहिये
क्योंकि यह समय उस उच्च समय से मेल खाता जो पाचन के लिये जिम्मेदार है| आयुर्वेद
पूरे दिन में दोपहर के भोजन को सबसे भारी होने की अनुशंसा करता है| भोजन
के उपरांत थोड़े देर चलना अच्छा होता है जिससे भोजन के पाचन में सहायता मिलती है|
हल्की नींद का अलावा नींद को टालना चाहिये क्योंकि आयुर्वेद में दिन
में सोना प्रतिबंधित है|
*संध्या का समय |Twilight - Zone
*दिन और रात के संतुलन के लिये यह विशेष समय है|
यह समय शाम की प्रार्थना और ध्यान के लिये होता है|
रात्रि का भोजन |Dinner
*रात्रि का भोजन शाम को ६-७ बजे करना चाहिये|
यह दोपहर के भोजन से हल्का होना चाहिये| रात्रि
का भोजन सोने से करीब तीन घंटे पहले लेना चाहिये जिससे भोजन के पाचन के लिये
पर्याप्त समय मिल सके| रात्रि के भोजन के तुरंत बाद भारी पेट से साथ
सोने को टालना चाहिये| भोजन के बाद १०-१५ मिनिट चलने से पाचन में
सहायता मिलती है|
*सोने का समय |Bedtime
*रात्रि १०.३० बजे तक सो जाने का सबसे आदर्श
समय है| तंत्र को शांत करने के लिये, सोने से पहले
पैर गुनगुने पानी से धुल कर साफ़ सूती कपडे से पोंछ कर पैर के तलवे की सरसों के तेल से मालिश की जा सकती है|
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
"आयुर्वेद का अर्थ है वह ज्ञान जिससे आयुष अथवा
जीवन को विस्तार मिलता है. आयुर्वेद वह शास्त्र है जो भारत के समृद्ध औषधीय और
चिकित्सीय संपदा का गोचर है. दुर्भाग्यवश हम अपनी ही धरोहर में मिले इस विज्ञान को
भूलते जा रहे हैं जिसके प्रयोग से जीवन ना सिर्फ़ रोग मुक्त किया जाता है अपितु
अप्रतिम रूप से स्वास्थ्य की ओर संचालित भी
किया जा सकता है.
आयुर्वेद का इतिहास एवं मूलभूत सिद्धांत
आयुर्वेद प्राचीन भारत में चिकित्सा की प्रयोग
की जाने वाली पद्धति है जिसमें रोग का निवारण जड़ से किया जाता है. इस विद्या का
प्रयोग भारत के ऋषि-मुनि एवं ज्ञानियों द्वारा 2000 से 5000 वर्ष पूर्व किया जाता
था. यह चिकित्सा प्रणाली वास्तव में modern medicine से ग़ूढ
और अधिक प्रभावशाली है क्योंकि इसमे रोग के वास्तविक कारण का निवारण किया जाता है.
शरीर में स्वास्थ का निर्माण कर यह चिकित्सा प्रणाली अनियमित जीवन शैली से उत्पन्न
अनेक रोगों को सफलता पूर्वक निवृत्त करती है. आयुर्वेद के अनुसार मन और शरीर दोनों
आपस में जुड़े हुए हैं. मन में उत्पन्न दोषों से ही शरीर में व्याधि प्रगट होती है
तथा शारीरिक रोगों के निवारण के लिए मानसिक स्वास्थ का विशेष महत्व आयुर्वेद में
निर्धारित है. ayurveda founded by seer प्राचीन काल में
आयुर्वेद का विज्ञान मौखिक रूप से ही गुरु द्वारा शिष्य को दिया जाता था . ऋग्वेद
में आयुर्वेद संबंधित चिकित्सा वर्णन सबसे पहले देखने को मिलता है. परंतु मूलतः
आयुर्वेद अथर्ववेद का अंग है. बाद में सरल रूप देते हुए आयुर्वेद के मूल
सिद्धांतों को दर्शाने वाले कुछ लिखित मूलग्रंथ सुश्रुत, चरक और
वागभट्ट द्वारा दिए गये हैं. इसके अलावा अन्य छोटे ग्रंथों में आयुर्वेदिक पद्धति
के अनुरूप विभिन्न रोग क्षेत्रों में अनेक चिकित्सा प्रणालियों का वर्णन है. परंतु
विस्मित करने वाली बात यह है कि सभी ग्रंथ और अलग प्रकार की चिकित्सा में आयुर्वेद
के मूल सिद्धांतों पर ही केंद्रित हैं जिन्हे रोज़मर्रा के जीवन में भी सरलता
पूर्वक प्रयोग किया जा सकता है. इससे भी अधिक आश्चर्य तब होता है जब हम प्रकृति
तथा संपूर्ण ब्रह्मांड में आयुर्वेद के इन्ही मूलभूत सिद्धांतों को लागू पाते हैं.
यह कहना कोई अतिशयोक्ति नही की आयुर्वेद एक विस्मयकारी, रहस्यदर्शी
और वैज्ञानिक विद्या है जिसका विस्तार पूरे विश्व में मिलता है.
"
*-------------------------*
अगर हमारे शरीर को स्वस्थ रखना है तो इम्यून
सिस्टम को मजबूत बनाना बहुत जरूरी है ताकि वो हमारे शरीर पर हमला करने वाले
बैक्टीरिया से लड़ सके. यहां जानिए ऐसे कुछ आयुर्वेदिक नियम जिनको फॉलो करने से
इम्यून सिस्टम बूस्ट होता है और शरीर हेल्दी रहता है*
*दवा सिर्फ बोतलों और गोलियों में नहीं होती।*
*व्यायाम दवा है।*
*सुबह की सैर दवा है।*
*उपवास दवा है।*
*गहरी नींद भी दवा है।*
*प्राकृतिक चिकित्सा दवा है।*
*नियमित योग करना दवा है।*
*सकारात्मकता दवा है।*
*हमेशा खुश रहना दवा है।*
*हंसी और हास्य भी दवा है।*
यज्ञ भी दवा है सभी तो हैं आदर्श दिन चर्या का
हिस्सा और स्वस्थ रहने के बहूमूलय सूत्र।
हमेशा कहा जाता है कि खुश रहा करो, ये
सिर्फ एक वाक्य नहीं है, इसके वास्तव में कई मायने हैं. जो लोग
खुश रहते हैं और खुलकर हंसते हैं, उनके शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति सही
ढंग से होती है. इससे उनका इम्यून सिस्टम तो बेहतर होता ही है, इसके
अलावा हृदय, फेफड़े और मांसपेशियां उत्तेजित होते हैं.
मस्तिष्क से एंडोर्फिन हार्मोन निकलते हैं, जिससे तनाव
कम होता है और तनाव की वजह से होने वाली तमाम समस्याओं से बचाव होता है. इसलिए
खुलकर हंसने की आदत डालें.
हमें बचपन में सिखाया गया है कि खाना खाते समय
बोलना नहीं चाहिए. लेकिन हम इस नियम को मानते नहीं. आयुर्वेद के मुताबिक शांति से
भोजन करने से हम न सिर्फ खाने के स्वाद का आनंद ले पाते हैं, बल्कि
तृप्त होकर भोजन करते हैं. इससे हमें बार बार भूख का अहसास नहीं होता. खाया हुआ
भोजन हमारे शरीर को लगता है और हमारा शरीर अंदर से बलवान बनता है.
हमें बचपन में सिखाया गया है कि खाना खाते समय
बोलना नहीं चाहिए. लेकिन हम इस नियम को मानते नहीं. आयुर्वेद के मुताबिक शांति से
भोजन करने से हम न सिर्फ खाने के स्वाद का आनंद ले पाते हैं, बल्कि
तृप्त होकर भोजन करते हैं. इससे हमें बार बार भूख का अहसास नहीं होता. खाया हुआ
भोजन हमारे शरीर को लगता है और हमारा शरीर अंदर से बलवान बनता है.
शरीर की मालिश करने की आदत डालिए. इससे न सिर्फ
शरीर का रूखापन खत्म होता है बल्कि ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है. स्किन शाइन करती
है और पाचन क्रिया बेहतर होती है. पाचन क्रिया में सुधार आने से अपच, वायु
और पित्त विकार, बवासीर, अनिद्रा
आदि तमाम बीमारियों से शरीर का बचाव होता
है.
आजकल भोजन में शुद्धता नहीं रह गई है. हम
प्रदूषण, केमिकलयुक्त भोजन करने के आदि बनते जा रहे हैं और इस कारण भी हमारा
इम्यून सिस्टम कमजोर हो रहा है. इससे बचने के लिए गुनगुना पानी पीने की आदत डालिए.
गुनगुने पानी में सूक्ष्म गुण होते हैं जो शरीर की सूक्ष्म जल वाहिकाओं में गहराई
से प्रवेश कर अशुद्धियों को बाहर निकालते हैं.
आयुर्वेद में हमेशा अच्छी तरह दांत और जीभ की
सफाई की बात कही गई है. इससे मुंह के बैक्टीरिया दूर होते हैं. इससे तमाम
बैक्टीरिया हमारे शरीर में नहीं जा पाते और शरीर तमाम बीमारियों से बचा रहता है.
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534
19/06/2024, 7:06 am
- Yashpal S Barampur: (७)
"व्यवस्थित दिन चर्या"
**आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
सनातन वांग्मय में मनुष्य की दिन चर्या को
विस्तार और तथ्यों के आधार पर बताया समझाया गया है जिस के अनुसार आचरण करने से मन
बुद्धि और शरीर को स्वस्थ रखने में सहायता मिलती है और रोगों से बचा जा सकता है
उनमें से एक है।
*---------------------------------*
निद्रा शयन (सोना) जीवन की
महत्त्वपूर्ण क्रिया है , जिसका नियमित होना परम आवश्यक है
। रात्रि 23-00 बजे से 03-00 बजे के दौरान
आपके रक्त संचरण का अधिक भाग लीवर की ओर केन्द्रित होता है । जब लीवर अधिक खून
प्राप्त करता है तब उसका आकार बढ़ जाता है । यह महत्त्वपूर्ण समय होता है जब आपका
शरीर विष हरण की प्रक्रिया से गुजरता है । आपका लीवर शरीर द्वारा दिन भर में एकत्रित
विषाक्त पदार्थों को निष्क्रिय करता है और खत्म भी करता है ।
(१) यदि आप रात्रि में 23-00 बजे सो जाते हैं
तो आपके पास अपने शरीर को विषमुक्त करने के लिए पूरे चार घण्टे होते हैं । यदि
24-00 बजे सोते हैं तो 3 घण्टे , 01-00 बजे सोते हैं तो 2 घण्टे और यदि 02-00 बजे सोते हैं तो केवल
एक ही घण्टा विषाक्त पदार्थों की सफाई के लिए मिलता है ।कहने का मतलब यह है कि आप
इन चार घण्टों को जितना सोने में व्यतीत करोगे , शरीर
उतना ही स्वस्थ रहेगा । उतने ही अधिक विषाक्त पदार्थ नष्ट हो सकेंगे और यही
विषाक्त पदार्थों का नष्ट होना आपकी स्वास्थ्य रक्षा करेगा ।
(२) अगर आप रात्रि 03-00 बजे के बाद सोते हैं
तो दुर्भाग्य से आपके पास शरीर को विषमुक्त करने के लिए कोई समय नहीं बचता । यदि
आप इसी तरह से सोना जारी रखते हैं , तो समय के साथ ये विषाक्त पदार्थ आपके
शरीर में जमा होने लगते हैं और यही एक समय आपके शरीर में विकराल बीमारी का कारण
बनते हैं ।
(३)
क्या आप कभी देर तक जागे हैं? क्या आपने महसूस किया है कि अगले दिन
आपको बहुत थकान होती है , चाहे आप दिन मैं कितने भी घण्टे सो लें
, कोई लाभ नहीं मिलने वाला ?
(४) शरीर को विषमुक्त करने का पूरा समय न देकर
आप शरीर की कई महत्त्वपूर्ण क्रियाओं से भी चूक जाते हैं । क्योंकि प्रात: 03-00
बजे से 05-00 बजे के बीच का समय में रक्त संचरण का केन्द्र आपके लंग्स ( फेंफड़े)
होते हैं । इस समय आपको ताज़ी हवा में साँस लेना चाहिए और व्यायाम करना चाहिए ।
किसी उद्यान में जाके अपने शरीर में अच्छी ऊर्जा भर लेनी चाहिए , इस
समय हवा एकदम ताज़ी और लाभप्रद गुणों से भरपूर होती है ।
(५) प्रात: 05-00 बजे से 07-00 बजे के बीच रक्त
संचरण का केन्द्र आपकी बड़ी आँत की ओर होता है । आपको इस समय शौच व स्नानादि करना
चाहिए ।अपनी बड़ी आँत से सारा अनचाहा मल बाहर कर देना चाहिए । भगवत् भजन आदि करें ।अपने शरीर को दिन भर ग्रहण किए
जाने वाले पोषक तत्वों के लिए तैयार करें ।
(६) सुबह 07-00 बजे से 09-00 बजे के बीच का समय
रक्त संचरण का केन्द्र आपका पेट या अमाशय होता है । इस समय आपको जलपान ( अल्पाहार ,
बालभोग तथा पाश्चात्य में कहें तो नाश्ता ) करना चाहिए । यह दिन का
सबसे जरूरी आहार है । ध्यान रखें कि इसमें सारे आवश्यक पोषक तत्त्व हों | सुबह
बालभोग न करना भविष्य में कई स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का कारण भी बनता है ।
यदि आपके पास अपने दिन की शुरुआत करने का आदर्श तरीका आ गया है । अपने शरीर
की प्राकृतिक जैविक घड़ी का अनुसरण करते हुए अपनी प्राकृतिक दिनचर्या का पालन करें
और हमेशा स्वस्थ रहें , व्यस्त रहें , प्रसन्न
रहें , मस्त रहें , आनंदित रहें ।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रतन मो9837342534
19/06/2024, 7:08 am
- Yashpal S Barampur: (८)
*दिन चर्या के आयुर्वेद सूत्र*
**आयुर्वेद सरल चिकित्सा**
आयुर्वेद दिन चर्या एवं स्वास्थ्य विज्ञान के
छोटी-छोटी किन्तु बहुमुल्य सूत्र
*---------------------------------------------*
स्वस्थ रहने के तरीक़े * व्यक्ति स्वस्थ रहना
चाहता है , कोई भी अपने जीवन में अस्वस्थता के दर्शन नहीं
करना चाहता । दुनियाँ के सबसे बड़े सात डाक्टर हैं , जो सदा
आपके साथ हैं । कोई शुल्क नहीं , बस समय का सदुपयोग करना है ।
निम्न
बातों का पालन करना है :- (१) सूर्य नारायण भगवान् की किरणें जो सूर्योदय के समय की हैं , उनका
सेवन करें । नेत्रों से दर्शन करें तथा अर्घ्य
प्रदान करें ।
(२) नित्यप्रति रात्रिकाल में 6 से 8 घंटे की
नींद अवश्य लें । जल्दी सोना और जल्दी जगाना स्वास्थ्यवर्धक होता है । रात्रि 11
बजे से प्रातः 3 बजे तक का शयन शरीर में अमृत तत्त्व का संचार करता है ।
(३) शुध्द शाकाहारी भोजन समयानुसार लें । जलपान
, मध्याह्न , रात्रि व अन्य अल्पाहार का समय निश्चित
होना चाहिए । हाथ-पैर धोकर व बैठकर , पालथी लगाकर ही भोजन करें । फलों ,
हरी सब्ज़ियों व दालों का नित्यप्रति के भोजन में समावेश हो । पतली सब्ज़ीयाँ
खाने का अधिक लाभ है ।
(४)अकेला गेहूं की रोटी के सापेक्ष मिश्रीत
अनाज का या अनाज बदल कर खाने में प्रयोग करें जैसे मक्का ज्वार बाजरा कोदो मंडवा
जौ साठी चावल आदि इससे आप डाइबिटीज तथा कोलेस्ट्रॉल से बचें
रहेंगे।
(५) नित्यप्रति व्यायाम अवश्य करें , १ से २
किलोमीटर टहलने जावें तो चेतना शक्ति व
ऊर्जा शक्ति भरपूर प्राप्त होती है ।
(६)
खुद पर विश्वास रखें और हमेशा धनात्मक विचार रखें , नकारात्मक
विचारों का
त्याग करें ।
(७) पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करें ,
क्यूँकि जल ही जीवन है । जल पीते रहोगे तो ग्लूकोज़ जनित रोगों से
तथा किडनी रोगों से बचे रहोगे ।
(८)खाने के बाद एक डली गुड़ खाने से गैस नहीं
बनती।
(९)बोतल बंद पानी पीनेसे बचना चाहिए यदि उच्च हिमालय क्षेत्र
बंगाल असम के दल दली क्षेत्र में नहीं रहते आपको आयोडीन युक्त नमक नहीं खायें
(१०)४० वर्ष की आयु के बाद नमक और चीनी कम ही
खायें तो स्वस्थ रहेंगे
(११) अच्छे दोस्त , अच्छा
वातावरण , अच्छा चिन्तन , सुन्दर स्वभाव व धार्मिक ग्रन्थों
शिक्षा प्रद पुस्तकों का पठन-पाठन शास्त्र संगीत परोप कार का कार्य और किसी पीडित
जरुरत मंद की सहायता करना मन को शांति देता है ।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न मो०9837342534
Comments
Post a Comment