आयुर्वेद और नवरात्र
*
*नवरात्रों पर
मां भगवती के नौ अलग-अलग रुपों में
आयुर्वेद की महा औषधियों का वर्णन और उपयोग*
*इन 9 औषधियों में विराजती है नवदुर्गा*
*--------------------------------*
मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण
कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार
में उपलब्ध वह दिव्य आयुर्वेदिक औषधियां, जिन्हें मां
दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है।
नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम
मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया और चिकित्सा प्रणाली के इस
रहस्य को ब्रह्माजी द्वारा उपदेश में दुर्गाकवच कहा गया है।
ऐसा माना जाता है कि यह औषधियां समस्त
प्राणियों के रोगों को हरने वाली और समस्त रोगों से बचा कर रखने के लिए एक रक्षा कवच का कार्य करती
हैं, इसलिए इसे दुर्गाकवच कहा गया। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से
बचकर सौ वर्ष जीवन जी सकता है।
आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को
जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है -
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी..
*1. प्रथम शैलपुत्री यानी हरड़*
नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है।
कई प्रकार की समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती
है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो
सात प्रकार की होती है।
इसमें१- हरीतिका (हरी) :-
भय को हरने वाली है कैंसर को ठीक करने वाली।
२-पथया -या अभय :-
हित
करने वाली है अर्श नाशक पेट साफ करने वाली ।
३--कायस्था -:-
जो
शरीर को बनाए रखने वाली है शक्ति देने वाली त्वचा रोगों में उपयोगी प्रोटेस्ट को
ठीक करने वाली।
४--अमृता
या विजया-:-
अमृत
के समान वात पित्त और कब तिनों का समन करने वाली बाल रोगों को दूर करने वाली अल्सर को ठीक करने वाली पुरुषों के प्रोटेस्ट
रोग को ठीक करने वाली:-
५--हेमवती - हिमालय पर होने वाली शीतल ता देने
वाली पथरी को निकालने वाली प्रदर ठीक करने वाली पेशाब रोगों को ठीक करने वाली ।
६--चेतकी :-
-चित्त को प्रसन्न करने वाली है दर्द को ठीक
करने वाली आंत्र रोगों को ठीक करने वाली।
७-श्रेयसी
शिवा:-
(यशदात
बढ़ाने वाली)- अल्जाइमर मोनो भ्रंस अवसाद को ठीक करने वाली
कल्याण
करने वाली रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाली आयु को बढ़ाने वाली।
*2. द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी*
ब्राह्मी, नवदुर्गा
का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर
विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है मानसिक व्याधि से बचाने
वाली अवसाद अल्जाइमर से मोनो भ्रंस से बचाने वाली है इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी
कहा जाता है यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी
रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ
औषधि है अनिद्रा को दूर करती है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी
कीआराधना करना चाहिए।
तृतीयं चंद्रघण्टेति
कुष्माण्डेती चतुर्थकम
*3. तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर*(हालो) in
नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे
चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की
पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।
यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है,
इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं।
शारीरिक शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक
करने वाली वात के रोगों को ठीक करने वाली
शिशुओं और र किशोरों की लम्बाई बढ़ाने वाली अग्नाश्य (पेंक्रियाज)को ठीक करने वाली
चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना
चाहिए।
*4. चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा*
नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि
से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा
भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर
पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान
है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त
पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के
साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।
पंचम स्कन्दमातेति
षष्ठमं कात्यायनीति च
*5. पंचम स्कंदमाता यानि अलसी*
नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें
पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात,
पित्त, कफ, रोगों की नाशक
सर्वाइकल पेन स्लिप डिस को ठीक करने वाली मांस पेसियो को शक्ति प्रदान करने वाली
औषधि है नीलपुष्पी (पावर्तती) स्यादुमा क्षुमा अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके
कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की
आराधना करना चाहिए।
*6. षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया*(अम्बा हल्दी)
नवदुर्गा काछठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद
में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका,
अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ,
पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है।
इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करना चाहिए।
सप्तमं कालरात्री
ति महागौरीति चाष्टम
*7. सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन*(बड़ी दूधी)
दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे
महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि केरूप
में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं
मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वालीऔषधि है।
इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के
सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि
है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।
*8. अष्टम महागौरी यानि तुलसी*
नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे
प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो
प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली
तुलसी, मरुतात तुलसी, दवना तुलसी, कुढेरक
तुलसी, अर्जक तुलसी और षटपत्र तुलसी। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ
करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।
तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि:
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति
को करना चाहिए।
नवमं सिद्धिदात्री च
नवदुर्गा प्रकीर्तिता
*9. नवम सिद्धिदात्री यानी शतावरी*
नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे
नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह
रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है।
सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर
हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए। इस
प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराणो के अनुसार नौ औषधि
के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर
मनुष्य को स्वस्थ करती है।
अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना
चाहिये
*नवरात्र*
*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
नवरात्र वृत या उपवास ।*
*-----------------------------*
प्रकृति देवी स्वरूप है और नवरात्र का अर्थ है
प्रकृति की आराधना यही भाव हमें पर्यावरण
संतुलन की ओर प्रेरित करता है प्रकृति की आराधना और शक्ति के आवाहन के साथशरद और
बसंत कालीन नव रात के पहले दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव संवत्सर का
प्रारंभ हमारी सांस्कृतिक आध्यात्मिक धार्मिक और वैज्ञानिक विचारों का उज्जवल पक्ष
है संसार में जो कुछ भी है सभी दैवीय
(प्रकृति प्रदत) है संसार में कौन सा ऐसा पदार्थ
और जीव जो भी है प्रकृति से शक्ति
पाता है इसे यदि विस्तार रूप में देखें तो प्रकृति से ही सभी को जीवन मिलता है और
प्रकृति से ही पालन पोषण होता है और प्रकृति ही काल का कारण बनती है अंतोगत्वा
प्रकृति से विलीन हो जाता है प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ऐसी
भावना दुनिया की किसी संस्कृति और धर्म में नहीं मिलती जहां पृथ्वी और नदियों को
मां माना जाता है उपयोगी पेड़ों को पर्वतों पत्थरों को देव माना जाता है ।
*सनातन वांग्मय पुर्ण तय विज्ञान पर आधारित है
विषेश कर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का भाव सनातन वांग्मय का आधार है
सर्दी से गर्मी आने पर बसंत नवरात्र और गर्मी से सर्दी आने पर शरद नवरात्र का
विधान महॠषि मरीच कश्यप संहिता में है मरीच कश्यप ॠषि सनातन धर्माचार्य के साथ साथ
आयुर्वेद के प्रवर्तक ॠषियों में से हैं आयुर्वेद के स्वस्थ रहने के नियम तथा शिशु
एवं बाल रोग चिकित्सा ग्रंथ की रचना महॠषि कश्यप द्वारा की गयी है ।
योरोपीय और अमेरिका जैसे देशों में जहां केवल
सर्दी का मैसम होता है और विषवत रेखय प्रदेशों में केवल गर्म मौसम ही होता है वहां
के निवासी वर्ष भर एक जैसा आहार खाते हैं
इस के इतर भारत में तीन तरह का मौसम
होता है और अलग-अलग मौसम में अलग-अलग फल सब्जियां अनाज पैदा होते हैं और
खाये जाते हैं ।
इस के लिये सनातन वांग्मय में वर्ष में दोबारा
बसन्त ऋतु के नवरात्र व्रत जब सर्दी समाप्त
हो जाती है और गर्मी का आरम्भ होता है तथा शरद नवरात्र जब गर्मी का मौसम
चला जाता है और सर्दी प्रारंभ होती है आहार तन्त्र को शुद्ध करने का विधान है और
इस उपवास को धर्म से जोड़ दिया गया जिस से अधिक से अधिक व्यक्ति इस से लाभान्वित
हो।
अब तो योरोप और अमेरिका में हुए रिसर्च से यह
बात सामने आई है उपवास रखने से रोग रोधी शक्ति बढ़ती है आज वहां भी उपवास रखने लगे
हैं स्वस्थ रहने के लिए जो बात भारतीय मनिषीयों ने हजारों साल पहले धर्म के माध्यम
से बताई वहीं आज का आधुनिक विज्ञान
हजारों साल बाद बता रहा है , तभी
तो सनातन संस्कृति उत्तम है सर्वोत्तम है प्रतिएक धार्मिक कर्मकांड के साथ विज्ञान
जुड़ा है प्रकृति का संरक्षण मानव स्वास्थ्य जुड़ा है।
सर्दी का मौसम समाप्त हो जाता है वसंत ऋतु के
आगमन के साथ ही गर्मी शुरू हो जाती है सर्दियों में खाते जाने वाली सब्जियां और फल
समाप्त हो जाते हैं खाने का अनाज और हमारा जीने का तरीका बदल जाता है
वर्षा ऋतु और(गर्मी)का मौसम समाप्त हो जाता है और शरद ऋतु का आरम्भ होता है गर्मी
में उत्पन्न होने वाले फल सब्जियां अनाज
समाप्त हो जाते हैं
इसी प्रकार ६महिने बाद मौसम बदलता है तो हमें
भी मौसम और नवीन आहार के अनुरूप खुद को और अपने आहार तंत्र को बदलना होता है
नये अनाज फल और सब्जियों मौसम के अनुसार उपयोग
के लिए आ जा ते हैं मौसम के अनुसार नये तरह-के खाद्य पदार्थों को पचाने के
लिए उत्तम स्वास्थ्य और रोग रहित शरीर के
लिए।
आहार तन्त्र को (अपडेटेड) तैयार करने के लिए आहार तन्त्र को
शुद्ध करना आवश्यक है आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ७से९दिन
में मानव शरीर में हमारे द्वारा खाये गये पदार्थों की सभी मात्रा मल मुत्र पसीना
द्वारा
निकल जाती है और आहार तन्त्र शुद्ध हो जाता है।
उपवास ,आप हो सके तो 7 से 9दिन केवल जल आहार लें
यदि जल
आहार पर नहीं रह सकते तो एक समय फल आहार लें यदि आप फिर भी नहीं रह सकते एक समय
शुद्ध शाकाहारी हल्का-सुपाचय वसा रहित भोजन लें सकते हैं
इस के अलावा गरिष्ठ वसा युक्त सुखे मेवे मावे से बनी मिठाई यदि आप एक समय भी खाते हैं
तब आप का उपवास करना निरर्थक और
निष्प्रयोजन है नवरात्र वृत्त धारमीक कर्म
कांड ही नहीं अगले ६महीने*नवरात्र*
*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
आयुर्वेद की नजर में नवरात्र वृत या उपवास।*
*-----------------------------*
प्रकृति देवी स्वरूप है और नवरात्र का अर्थ है
प्रकृति की आराधना यही भाव हमें पर्यावरण
संतुलन की ओर प्रेरित करता है प्रकृति की आराधना और शक्ति के आवाहन के साथ नव
संवत्सर का प्रारंभ हमारी सांस्कृतिक
आध्यात्मिक धार्मिक और वैज्ञानिक विचारों
का उज्जवल पक्ष है संसार में जो कुछ भी है
सभी दैवीय (प्रकृति प्रदत) है संसार में कौन सा ऐसा पदार्थ और जीव
जो भी है प्रकृति से शक्ति पाता है इसे यदि विस्तार रूप में देखें तो
प्रकृति से ही सभी को जीवन मिलता है और प्रकृति से ही पालन पोषण होता है और
प्रकृति ही काल का कारण बनती है अंतोगत्वा परकति से विलीन हो जाता है ।
*सनातन वांग्मय पुर्ण तय विज्ञान पर आधारित है
विषेश कर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का भाव सनातन वांग्मय का आधार है
सर्दी से गर्मी आने पर बसंत नवरात्र और गर्मी से सर्दी आने पर शरद नवरात्र का
विधान महॠषि मरीच कश्यप संहिता में है मरीच कश्यप ॠषि सनातन धर्माचार्य के साथ साथ
आयुर्वेद के प्रवर्तक ॠषियों में से हैं आयुर्वेद के स्वस्थ रहने के नियम तथा शिशु
एवं बाल रोग चिकित्सा ग्रंथ की रचना महॠषि कश्यप द्वारा की गयी है ।
योरोपीय और अमेरिका जैसे देशों में जहां केवल
सर्दी का मैसम होता है और विषवत रेखय प्रदेशों में केवल गर्म मौसम ही होता है वहां
के निवासी वर्ष भर एक जैसा आहार खाते हैं
इस के इतर भारत में तीन तरह का मौसम
होता है और अलग-अलग मौसम में अलग-अलग फल सब्जियां अनाज पैदा होते हैं और
खाये जाते हैं ।
इस के लिये सनातन वांग्मय में वर्ष में दोबारा
बसन्त ऋतु के नवरात्र व्रत जब सर्दी समाप्त
हो जाती है और गर्मी का आरम्भ होता है तथा शरद नवरात्र जब गर्मी का मौसम
चला जाता है और सर्दी प्रारंभ होती है आहार तन्त्र को शुद्ध करने का विधान है और
इस उपवास को धर्म से जोड़ दिया गया जिस से अधिक से अधिक व्यक्ति इस से लाभान्वित
हो।
अब तो योरोप और अमेरिका में हुए रिसर्च से यह
बात सामने आई है उपवास रखने से रोग रोधी छमता बढ़ती है आज वहां भी उपवास रखने लगे
हैं स्वस्थ रहने के लिए जो बात भारतीय मनिषियो ने हजारों साल पहले धर्म के माध्यम
से बताई वहीं आज का आधुनिक विज्ञान
हजारों साल बाद बता रहा है , तभी
तो सनातन संस्कृति उत्तम है सर्वोत्तम है प्रतिएक धार्मिक कृया के साथ विज्ञान जुड़ा
है प्रकृति का संरक्षण मानव स्वास्थ्य जुड़ा
है।
सर्दी का मौसम समाप्त हो जाता है वसंत ऋतु के
आगमन के साथ ही गर्मी शुरू हो जाती है सर्दियों में खाते जाने वाली सब्जियां और फल
समाप्त हो जाते हैं खाने का अनाज और हमारा जीने का तरीका बदल जाता है
वर्षा ऋतु और(गर्मी)का मौसम समाप्त हो जाता है और शरद ऋतु का आरम्भ होता है गर्मी
में उत्पन्न होने वाले फल सब्जियां अनाज
समाप्त हो जाते हैं
इसी प्रकार ६महिने बाद मौसम बदलता है तो हमें
भी मौसम और नवीन आहार के अनुरूप खुद को और अपने आहार तंत्र को बदलना होता है
नये अनाज फल और सब्जियों मौसम के अनुसार उपयोग
के लिए आ जा ते हैं मौसम के अनुसार नये तरह-के खाद्य पदार्थों को पचाने के
लिए उत्तम स्वास्थ्य और रोग रहित शरीर के
लिए।
आहार तन्त्र को (अपडेटेड) तैयार करने के लिए आहार तन्त्र को
शुद्ध करना आवश्यक है आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ७से९दिन
में मानव शरीर में हमारे द्वारा खाये गये पदार्थों की सभी मात्रा मल मुत्र पसीना
द्वारा
निकल जाती है और आहार तन्त्र शुद्ध हो जाता है।
उपवास ,आप होसके तो9दिन केवल जल आहार लें
यदि जल
आहार पर नहीं रह सकते तो एक समय फल आहार लें यदि आप फिर भी नहीं रह सकते एक समय
शुद्ध शाकाहारी हल्का-सुपाचय वसा रहित भोजन लें सकते हैं
इस के अलावा गरिष्ठ वसा युक्त सुखे मेवे मावे से बनी मिठाई यदि आप एक समय भी खाते हैं
तब आप का उपवास करना निरर्थक और
निष्प्रयोजन है नवरात्र वृत्त धारमीक कर्म
कांड ही नहीं अगले ६महीने स्वास्थ्य रहने की गारंटी भी है।
या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण ।संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
वंदे वांछितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम ।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम।।
या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण ।संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
वंदे वांछितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम ।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम।।
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