*जौ *
*आयुर्वेद सरल चिकित्सा*
जौ को मिलिट ही नहीं सुपर मिलिट कहा जाये तो
अतिश्योक्ति नहीं होगा।
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भारत का प्राचीन अनाज जौ ही है
कहा जाता है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों का
आहार मुख्यतः जौ थे। प्राचीन काल से जौ का उपयोग होता चला आ रहा है सनातन वांग्मय
में मांगलिक कार्यों में जौ का उपयोग किया जाता है जन्म हो या फिर शादी विवाह।
वेदों ने भी यज्ञ की आहुति के रूप में जौ को स्वीकार किया है। गुणवत्ता की दृष्टि
से गेहूँ की अपेक्षा जौ हलका धान्य है। उत्तर प्रदेश में आज से ५०, वर्ष
पहले गर्मी की ऋतु में भूख-प्यास शांत करने के लिए सत्तू का उपयोग अधिक होता था।
जौ को भूनकर, पीसकर, उसके आटे में
थोड़ा नमक और पानी मिलाकर सत्तू बनाया
जाता है। कई लोग नमक की जगह गुड़ भी डालते हैं। सत्तू में घी और चीनीऔर भूने हुए
चने का आटा मिलाकर भी खाया जाता है।
जौ का सत्तू ठंडा, अग्निप्रदीपक,
हलका, कब्ज दूर करने वाला, कफ एवं
पित्त को हरने वाला, रूक्षता और मल को दूर करने वाला है। गर्मी से
तपे हुए एवं कसरत से थके हुए लोगों के लिए सत्तू पीना हितकर है। मधुमेह के रोगी को
जौ का आटा अधिक अनुकूल रहता है। इसके सेवन से शरीर में शक्कर की मात्रा बढ़ती नहीं
है। जिसकी चरबी बढ़ गयी हो वह अगर गेहूँ और चावल छोड़कर जौ की रोटी एवं बथुए की या
मेथी की भाजी तथा साथ में छाछ का सेवन करे तो धीरे-धीरे चरबी की मात्रा कम हो जाती
है। जौ मूत्रल (मूत्र लाने वाला पदार्थ) हैं अतः इन्हें खाने से मूत्र खुलकर आता
है जौ से जवक्षार निकाला जाता है जो मूत्र कच्छ पेशाब में रुकावट तथा गुर्दे और
मूत्राशय कि पथरी की अच्छी औषधि है।
जौ को कूटकर, ऊपर के
मोटे छिलके निकालकर उसको चार गुने पानी में उबालकर तीन चार उफान आने के बाद उतार
लो। एक घंटे तक ढककर रख दो। फिर पानी छानकर अलग करो। इसको बार्ली वाटर कहते हैं।
बार्ली वाटर पीने से प्यास, उलटी, अतिसार,
मूत्रकृच्छ, पेशाब का न आना या रुक-रुककर आना,
मूत्रदाह, वृक्कशूल, मूत्राशयशूल
आदि में लाभ होता है।
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