मनुष्य शाकाहारी,या मांसाहारी
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मनुष्य की संरचना शाकाहारी या मांसाहारी आज यह
बहस का विषय है सबके अपने अपने तर्क हैं
शाकाहारी मानव को शाकाहारी की श्रेणी में होने के तर्क देते हैं और मांसाहारी भोजन
करने वाले आदिकाल से मनुष्य का विकास मांसाहार से कहते हैं परंतु विज्ञान कहता है।
वास्तव
में मानव भोजन भोगोलिक क्षेत्र परिस्थितियों और जलवायु के अनुसार विकसित हुआ है
मनुष्य ने आदिकाल से जीवित रहने के लिए सर्वहारी भोजन को अपनाया है जैसे शाकाहारी
जानवर गाय भैंस भेड़ बकरी हिरन यदि उन्हें घास ना मिले वह जीवित नहीं रह सकते इसी
तरह मांसाहारी जीव शेर चीता तेंदुआ आदि
मांसाहारी जीव हैं यह कभी भी घास नहीं खायेंगे और मांस ना मिलने की स्थिति में
समाप्त हो जायेंगे दोनों का आहार तंत्र प्रकृति ने अलग तरह से विकसित किया है कोई
जानवर मनुष्य की भांति भोजन नहीं करता है, प्रत्येक जानवर
का अपना भोजन होता है। यदि तुम गाय भैंसों को ले जाओ खेतों में और उन्हें वहां
छोड़ दो, तो वे सिर्फ एक खास तरह का घास ही खाएंगी। वे हर चीज और कोई भी चीज
नहीं खाने लगेंगी - वें बहुत चुन कर खाती हैं। अपने भोजन के प्रति उनकी एक
सुनिश्चित संवेदनशीलता होती है। मनुष्य बिलकुल भटक गया है, अपने
भोजन के प्रति वह बिलकुल संवेदनशील नहीं है। वह हर चीज खाता रहता है। असल में तुम
कोई ऐसी चीज नहीं खोज सकते जो मनुष्य द्वारा कहीं न कहीं खाई न जाती हो। कुछ
स्थानों में चींटियां खाई जाती हैं, कुछ स्थानों में सांप खाए जाते हैं,
कुछ स्थानों में कुत्ते खाए जाते हैं। मनुष्य हर चीज खाता है। मनुष्य
तो बस विक्षिप्त है। वह नहीं जानता कि किस चीज का उसके शरीर के साथ मेल बैठता है
और किस चीज का मेल नहीं बैठता। वह बिलकुल उलझा हुआ है।
स्वभावतः मनुष्य को शाकाहारी होना चाहिए,
क्योंकि उसका पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक भी
इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य-शरीर का सारा ढांचा यही बताता है कि मनुष्य
को मांसाहारी नहीं होना चाहिए। मनुष्य आया है बंदरों से। बंदर शाकाहारी हैं-पक्के
शाकाहारी हैं। यदि डार्विन की बात सच है तो मनुष्य को शाकाहारी होना चाहिए।
चिकित्सा और आहार विज्ञान के अब कई तरीके हैं
यह निर्णय करने के कि जानवरों की कोई प्रजाति शाकाहारी है या मांसाहारी: यह निर्भर
करता है अंतड़ियों पर, अंतड़ियों की लंबाई पर। मांसाहारी जानवरों की
आंत बहुत छोटी होती है। चीता, शेर-उनकी आंत बहुत छोटी होती है,
क्योंकि मांस पहले से ही पचाया हुआ भोजन है। उसे पचाने के लिए लंबी
आंत नहीं चाहिए। पचाने का काम तो जानवर ने ही पूरा कर दिया है। अब तुम खा रहे हो
जानवर का मांस। वह पचाया हुआ ही है, लंबी आंत की जरूरत नहीं है। मनुष्य की
आंत बहुत लंबी है : इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य शाकाहारी प्राणी है। लंबी पाचन क्रिया
चाहिए, और बहुत कुछ व्यर्थ होता है जिसे बाहर फेंकना होता है।
तो यदि आदमी मांसाहारी नहीं है और वह मांस खाता
है, तो शरीर बोझिल हो जाएगा। पूर्व में, सभी वेद
उपनिषद के ऋषियों ध्यानियों ने बुद्ध, महावीर-उन्होंने
मांसाहार न करने पर बहुत जोर दिया है। अहिंसा की धारणा के कारण नहीं-वह गौण है।
लेकिन इस कारण कि यदि तुम सच में ही गहरे ध्यान में उतरना चाहते हो तो तुम्हारे
शरीर को निर्धार होने की जरूरत है, स्वाभाविक और प्रवाहापूर्ण होने की
जरूरत है। तुम्हारा शरीर हलका होना चाहिए; और मांसाहारी का
शरीर बहुत बोझिल होता है।
कभी ध्यान देना कि क्या होता है जब तुम मांस
खाते हो : जब तुम किसी पशु को मारते हो तो क्या होता है उसे जब वह मरता है?
निश्चित ही, कोई नहीं मरना चाहता। जीवन स्वयं को
जारी रखना चाहता है, पशु स्वेच्छा से तो मर नहीं रहा है। अगर कोई
तुम्हारी हत्या करे, तो तुम शांति से तो मर नहीं जाओगे। यदि एक सिंह
छलांग लगा दे तुम पर और मार डाले तुमको, तो तुम्हारे मन
पर क्या गुजरेगी? वैसी ही तकलीफ सिंह को होती है जब तुम सिंह को
मारते हो। यंत्रणा, भय, मृत्यु, पीड़ा,
चिंता, क्रोध, हिंसा, उदासी-ये
सारी चीजें घटित होती हैं जानवर को। उसके सारे शरीर में हिंसा पीड़ा, यंत्रणा
फैल जाती है। सारा शरीर विषाक्त तत्वों से, जहर से
भर जाता है। शरीर की सारी ग्रंथियां जहर छोड़ देती हैं। क्योंकि जानवर बड़ी पीड़ा
में मर रहा होता है। और फिर तुम खाते हो उस मांस को उस मांस में वे सब जहर मौजूद
हैं जो जानवर ने छोड़े हैं। सारी बात जहरीली है। फिर वे सारे जहर तुम्हारे शरीर
में चले आते हैं।
और वह मांस जिसे तुम खा रहे हो, किसी
जानवर के शरीर का मांस है। वहां उसका कोई सुनिश्चित उद्देश्य था। एक विशिष्ट ढंग
की चेतना थी उस जानवर के शरीर में। तुम जानवर की चेतना की तुलना में ज्यादा ऊंचे
तल पर हो, और जब तुम जानवर का मांस खाते हो तो तुम्हारा शरीर जानवर के निम्न तल
पर आ जाता है। तब तुम्हारी चेतना और तुम्हारे शरीर के बीच एक दूरी पैदा हो जाती है,
एक तनाव पैदा हो जाता है, एक बेचैनी होने
लगती है।
तो तुम्हें वही चीजें खानी चाहिए जो स्वाभाविक
हैं-तुम्हारे लिए
स्वाभाविक हैं-फल, मेवा,
सब्जियां, जितना हो सके खाओ ये
सब। और मजे की बात यह है कि तुम इन चीजों को
अपनी जरूरत से ज्यादा नहीं खा सकते। जो कुछ भी स्वाभाविक होता है वह सदा तुम्हें
तृप्ति देता है, क्योंकि वह तुम्हारे शरीर को पोषण देता है,
तुम्हें सुखद अनुभूति देता है। तुम तृप्त अनुभव करते हो। यदि कोई बात
अस्वाभाविक है तो वह तुम्हें कभी तृप्ति की अनुभूति नहीं देती। आइसक्रीम खाते चले
जाओ : तुम कभी तृप्त अनुभव नहीं करते। असल में जितना तुम खाते हो, उतना
ही तुम्हें लगता है कि और खाओ। वह भोज्य पदार्थ नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया
जा रहा है। अब तुम शरीर की आवश्यकता के अनुसार नहीं खा रहे हो; तुम
बस स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ निर्णायक हो गई है।
जीभ
निर्णायक नहीं होनी चाहिए। वह पेट के बारे में कुछ भी नहीं जानती है। वह शरीर के
बारे में कुछ भी नहीं जानती है। जीभ का केवल एक काम है: भोजन का स्वाद लेना।
स्वभावतः, जीभ को सजग रहना होता है, केवल यह देखना
होता है कि कौन सा भोजन शरीर के लिए ठीक है-मेरे शरीर के लिए और कौन सा भोजन मेरे
शरीर के लिए ठीक नहीं है। वह दरवाजे पर बैठा चौकीदार है; वह मालिक
नहीं है। और यदि दरवाजे पर बैठा चौकीदार मालिक बन जाए, तो हर
चीज गड़बड़ा जाती है।
आज यह बहस बेमायने और किसी भी नतीजे पर न
पहूचने वाली है इसलिए जो वैज्ञानिक तथ्य है इस पोस्ट में वह बताने की कोशिश की है
शेष व्यक्ति का विवेक है वह क्या खाना चाहता है और उसकी तप्ति किस प्रकार के भोजन
से होती है जहां वह रहता है वहां जीवन के लिए भोजन का विकास कै से हुआ है उसकी
सामाजिक स्वीकार्यता मान्यता क्या है।
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