हरड़ अवधेश सिंह जी की वाल से साभार

 हरड़ या  हरीतकी को वैद्यों ने चिकित्सा साहित्य में अत्यधिक सम्मान देते हुए उसे अमृतोपम औषधि कहा है। राज बल्लभ निघण्टु के अनुसार-


यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी।

कदाचिद् कुप्यते माता, नोदरस्था हरीतकी ॥


(अर्थात् हरीतकी मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली है। माता तो कभी-कभी कुपित भी हो जाती है, परन्तु उदर स्थिति अर्थात् खायी हुई हरड़ कभी भी अपकारी नहीं होती। )

हरड़, टर्मिनलिया चेबुला पेड़ का फल है. इसे हरीतकी भी कहा जाता है. यह एक प्रसिद्ध जड़ी-बूटी है. आयुर्वेद में इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे कि अमृता, प्राणदा, कायस्था, विजया, मेध्या. हरड़ का इस्तेमाल कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है#सर्वरोगनाशक_बाल_हरड़

लवणेन कफं हन्ति, पित्तं हन्ति च शर्करा।

घृतेन वातजान रोगान, सर्व रोगान गुडान्विता ॥


अर्थात् यदि हर्रें का सेवन लवण के साथ किया जाए तो कफ का नाश होता है, शर्करा के साथ सेवन किया जाए तो पित्त का नाश होता है। घृत के साथ हरीतकी का सेवन किया जाए तो वात रोग नष्ट होता है। गुड़ के साथ सभी रोगों में उपयोगी है। यह एक सामान्य जानकारी है जो सभी लिए परमावश्यक है। 

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