दिनचर्या
आयुर्वेद के चमत्कार-
1 - दिनचर्या नियम स्वास्थ्य और आयु की रक्षा के लिए मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर मल मूत्रादि त्याग करना चाहिए, जल्दी मल मूत्र त्यागने से पेट के रोग नष्ट होते हैं। 2- मलमूत्र त्याग करके हाथ मुंह धो कर दातुन करनी चाहिए। दातुन करने से मुख संबंधी सभी रोग नष्ट होते हैं। 3 दांतुन के पश्चात स्नान करना चाहिए प्रातः स्नान अग्नि को दीपन करने वाला, शक्ति, आयु और ओज को बढ़ाने वाला तथा उत्साह, बुध्दिबल को देने वाला एवं खुजली, मैल, परिश्रम, पसीना, आलस्य, तृषा तथा पापों को नष्ट कर ईश्वर की भक्ति याद दिलाता है। अतः प्रातः स्नान अवश्य करना चाहिए। 4 स्नान के पश्चात मनुष्य को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, परमात्मा का ध्यान करना चाहिए क्योंकि वह परमेश्वर ही हमारे हानि, लाभ, जीवन, मरण तथा आरोग्यता और सुख दुखादि का जिम्मेवार तथा फल देता है। दोनों समय प्रभु भजन करने से हमारे सब रोग, शोक नष्ट होते हैं। ईश्वर भजन जन्म, मरण और ज्वरादि सकल रोगों की परमौषधि है। जो रोग किसी दवा से नष्ट न हो, वह ईश्वर स्मरण से नष्ट हो जाता है। अतः ईश्वर भजन अवश्य करना चाहिए। 5 मनुष्य को उचित है कि मात्रा से भारी, स्वभाव से भारी और संस्कार से भारी पदार्थ को अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। मूंग आदि मात्रा से अधिक खाने पर भारी है, उड़द आदि पदार्थ स्वभाव से भारी होते हैं, पीसा हुआ अन्न संस्कार से भारी होता है। ये उप लक्षण मात्र बताएं हैं।
6 - आहार छह प्रकार का होता है। एक - भोज्य (दाल भात आदि), दो भक्ष्य (लड्डू आदि), तीन लेह्य (खीर कढ़ी आदि), चार चूष्य (ईख, दाड़िम, आदि) पांच पेय (पानी, दूध आदि) छ चव्य (परवल, चने आदि)। उड़द और पीसे हुए अन्न आदि से आधी तृप्ति करनी चाहिए। मूंग आदि पदार्थों से अथवा स्वभाव से ही जो हल्के हैं उनसे पूरी तृप्ति करनी चाहिए। पानी, दूध, शर्बत, छाछ आदि पतले पदार्थ मात्र से अधिक खाने पर भी भारी नहीं होते। पीने के सब पदार्थ हल्के होते हैं। पीने के, चाटने के, खाने के, पदार्थों में उत्तरोत्तर भारीपन होता है। 7 मात्रा से अधिक खाने का आयुर्वेद में मना किया है क्योंकि अन्न मात्रा से अधिक सेवन किया जाए तो आलस्य, भारीपन, बदहजमी, अजीर्ण, पेट फूलना आदि विकार
होकर सभी रोगों को उत्पन्न करते हैं।
8 - पेट के दो भागों को अन्न से भरें, तीसरा भाग जल से भरें और चौथा भाग वायु (प्राण) के चलने फिरने के लिए रहने दें। जल भी अधिक मात्रा में सेवन न करें और बिल्कुल जल के न पीने से भी अन्न नहीं पचता है। इसलिए जल पीना चाहिए। भोजन के समय थोड़ा-थोड़ा जल बीच-बीच में सेवन करें और भोजन के 1 घंटे बाद जल पीना चाहिए। बिना भूख, तृषा के अन्न, जल नहीं लेना चाहिए। 9 यदि दोनों समय भूख नहीं लगे तो भोजन नहीं करना चाहिए। बिना भूख जो भोजन करता है, उसका शरीर अनेक रोगों का शिकार होता है और जो समय को टालकर भोजन करता है अर्थात भूख लगने पर भोजन नहीं करता, उसकी अग्नि मन्द हो जाती है और अजीर्णादि रोग उत्पन्न होते हैं। अजीर्ण हुए पर रात्रि में भोजन करने में भी दोष नहीं होता है किंतु संभ के भोजन से उत्पन्न हुए अजीर्ण में प्रातः भोजन करे तो अग्नि मन्द हो जाती है और ७... का विष के समान परिणाम होता है। अतः संध्या समय का भोजन किया हुआ यदि नहीं पचा हो तो प्रातः काल सौंठ, सेंधा नमक और हरड़ का चूर्ण शीतल जल के साथ लेकर 1 घंटे पश्चात भोजन करने से रात्रि के अजीर्ण का दोष नहीं होता है। 10 भोजन करने के बाद मनुष्य को धीरे-धीरे सौ कदम चलना चाहिए। इससे भोजन किया हुआ अन्न का समूह उदर में स्थित होता है और गर्दन, घुटने तथा कमर को सुख पहुंचाता है। भोजन के बाद प्रथम सीधा लेट कर आठ सांस लेने चाहिए फिर दाहिनी करवट से सोकर 16 सांस लेने चाहिए। इसके बाद बाई करवट से सोकर 32 सांस लेवे, पश्चात जैसी इच्छा हो उसी ढंग से करें, लेकिन दिन में निद्रा नहीं लेनी चाहिए क्योंकि दिन में सोने से कफ बढ़ता है और उससे कई रोग उत्पन्न होते हैं। ग्रीष्म ऋऋतु को छोड़कर शेष सब ऋऋतुओं में सोना नहीं चाहिए किंतु जिसे सोने की आदत पड़ गई हो तो थोड़ा सोना चाहिए तथा व्यायाम में तत्पर, मार्ग में चलने से थक गया हो और घोड़ा आदि वाहनों पर चढ़ने वाला हो तथा अतिसार, शूल, श्वास, तृषा, हिचकी रोग वाला, बालक, नशा करने वाला, वृद्ध, रस के अजीर्ण वाला, रात्रि में जागने वाला, उपवास करने वाला, ऐसे मनुष्य आनंद से दिन में सो सकते हैं। 11 संध्या काल में सब कापों को छोड़कर भगवान का भजन करना समय प्रभु भजन के सिवाय अन्य अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इसलि करके ही भोजन आदि करना तथा सोनाए।
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