भारतीय आहार विज्ञान और आधुनिक फ़ूड न्यूट्रीशन *
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* भारतीय (आयुर्वेद) बनाम आधुनिक ( फ़ूड, न्यूट्रीशन) का तुलनात्मक अध्ययन*
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*कहते हैं कि भोजन की खोज भारत में हुई है , पश्चिमी देशों में तो भोजन है ही नहीं केवल पेट भरने मात्र का साधन है । यहां सैकड़ो -हजारों व्यजन ऋतुओं व त्योहारों के अनुरूप हैं ।भारत में एक ही फल, सब्ज़ियों की सैकड़ों प्रजातियां पायी जाती है । जैसे आम की 500 प्रजातियां , धान की 400 प्रजातियां , गेहूं की सैकड़ों प्रजातियां , आलू की 25 प्रजातियां , और सब ऋतुओं के अनुसार प्रयोग की जाती थी । किस प्रवृति के लोगों को क्या खाना है , किस मौसम में क्या खाना है सब कुछ परंपरागत तरीके से भारत में होता था ।
*भारत में छह ऋतुएँ है , और ऋतुओं के अनुरूप भारतीय त्यौहार है , इन त्योहारों का हमारे भोजन से बड़ा गहरा संबंध है , हर त्योहार पर मिठाई , बचपन से लेकर आज तक त्योहारों पर बहुत मिठाई खाने को मिलती है लेकिन कुछ सालों से आज लोग त्योहारों पर मिठाई की बजाय नमकीन देना पसंद करते है , उन्हें लगता है मिठाई जैसे अछूत है , यह तो गरीब और मजदूरों के लिए है । लेकिन उन्हें यह ज्ञात नहीं कि मिठाई से ज्यादा नमक नुकसान करता है । खुद तो बिगड़े हुए हैं ही अपने बच्चों को और ज्यादा बिगाड़ रहे हैं ।
*हमने बचपन में सामान के लिए मिले पैसे बचाकर मिठाई खाने के लिए मार खायी है लेकिन आज बच्चे नमकीन चुराकर खाने के लिए मार खा रहे हैं ।
*वर्तमान शिक्षा पद्धति द्वारा फ़ूड एंड न्यूट्रीशन के नाम से लोगों को पौष्टिकता के बारे में जागरूक किया जा रहा है और आयुर्वेद हज़ारों वर्षों से जन सामान्य को पौष्टिकता और साथ ही साथ उस भोजन का हमारे भविष्य और आज के सम्पूर्ण स्वास्थ्य पर असर को बताता आया है ।
*आज अंडे को सबसे अधिक पौष्टिक मानकर खाने की सलाह विज्ञान की पुस्तक में बच्चों को दी जाती है, पर इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि ये अंडे बनने कैसे हैं यह बच्चों को क्यों नही सिखाया जाता है ? और इसका कितना गलत असर हमारे शरीर पर गलत पड़ता है ?
*विज्ञान की किताबों में चिकन मटन को प्रोटीन का सोर्स बताया जाता है। जबकि यह किसी जीव की हिंसा कर प्राप्त होते है। इसका हमारे भविष्य पर बहुत बुरा असर होता है , क्योंकि यह हमारे बुरे कर्मों को बढाता है। साथ ही ऐसे अन्न का असर हमारे वर्तमान पर भी बहुत बुरा होता है क्योंकि इससे अनेक बीमारियाँ होती है। हिंसा से प्राप्त भोजन हमारे अन्दर अनेक विकार उत्पन्न करता है ऐसी बातें बच्चों को नहीं सिखाई जाती हैं ।
*इसी तरह भोजन की तासीर को जाने बिना किसी भी रोगी को कुछ भी खाने को दिया जाता है । सर्जरी के बाद पेशंट को छोले खिला दिए जाते है।
*आज का विज्ञान सिर्फ शरीर को पुष्ट करने पर ध्यान देता है , जबकि आयुर्वेद ओजस के माध्यम से हमारे तेज कांति आरोग्यता पोषटिकता षोषण को भी बढाने पर ध्यान देता है ।*
*आज का विज्ञान खाने के ऋतु और समय से सम्बन्ध को नकारता है। जबकि आयुर्वेद में हर भोजन के साथ उसके खाने का समय और ऋतु का भी वर्णन है । इसका पालन करने से व्यक्ति बीमार पडेगा ही नहीं।
*आज के विज्ञान में भोजन बनाने के तरीकों पर ध्यान नहीं दिया जाता और अक्सर विरुद्ध आहार को सही माना जाता है , जैसे- सूप में दूध मिलाना ।
*जबकि आयुर्वेद के नियम आहार विज्ञान को अपनाने से बिमारी पास भी नहीं आएगीl
*आज का विज्ञान घी से दूर रहने की सलाह देता है और रिफाइंड तेलों पर जोर देता है. जबकि आयुर्वेद में घी और कच्ची घानी के तेलों का सेवन ज़रूरी बताया गया है।
कहते हैं जिसने अपने भोजन को पहचान लिया वह वीमार पड़ेगा ही नहीं, इसलिए भोजन को स्वाद के लिए नहीं अपितु तृप्ति के लिए कीजिएl
*कहने का तात्पर्य यह है आप की खाने की थाली में रक्खे खाद्य पदार्थ जो ॠतु अनुसार हों और एक दुसरे का विरुद्ध ना हो स्वास्थ् के लिए हित कारी हो ऋतु सम्मत हो मर्यादित हो आपके स्वास्थ्य और निरोगी जीवन की गारंटी है।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न
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