स्वदेशी अपनाये ,तो कैसे अपनाये ?*

 

भारत की जटिल कर प्रणाली इंस्पैक्टर राज लाईसेंस परमिट की जटिलता शिक्षा में टैक्निकल शिक्षा की कमी 

भारत के कामगारों में दक्षता और कार्य छमता की कमी सरकारों का वोट की राजनीति के लिए लिए गये दो निर्णय

उदाहरण के तौर  पर 20, वर्षों में मनरेगा पर अनुमानित 15लाख करोड़ रुपए सरकार खर्च कर चुकी है और फूड सिक्योरिटी पर 10, वर्षों में अनुमानित(16लाख करोड़ रुपये मुफ्त राशन)4लाख करोड़ रुपए किसान सम्मान निधि के नामपर सरकार ने खर्च कर दिया जिसमें गांव में गड्ढे खोद कर बंद किते गये नातों ढ़ांचा गत विकास हुआ और ना ही 

स्थाई रोजगार का सृजन हुआ सरकार यदि दुरदरशिता से काम लेती 30लाख करोड़ रुपए से स्माल स्केल इंडस्ट्रीज की एक ऐसी चेन खड़ी करदेती जिससे 10करोड रोगों को स्थाई रोज़गार मिलता चीन ने यही तो किया है अपने लोगों को दक्ष बनाया और इंडस्ट्री के विकास पर पैसा खर्च किया खैरात बांटने पर नहीं यदि सरकारें वोट के लिए खैरात बांटने के बजाये स्थाई रोजगार सृजन करती देश आत्म निर्भर हो गया होता चीन से आयात की निर्भरता कम हो जाती सरकार को स्वदेशी का नारा ना देना पड़ता ।


         स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व तथा कथित महात्मा  का नारा *"अंग्रेजों भारत छोड़ो"* आंदोलन के समय विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार करने का नारा लगाया था। गाँधी  के आवाहन पर विदेशी सामान की होली जलाई गयी थी। विदेशी सामान का बहिष्कार हर भारतवासी की जुबान पर आ गया था । *स्वदेशी अपनाओ* के नारे की  बुलंदी के बीच कपड़े तथा खाद्यान के अतिरिक्त लगभग सभी विदेशी चीजों ने भारत के बाजारों को पाट रखा था । यह हमारी विवशता ही थी कि अंग्रेजों ने हमें स्वाबलंबी बनने से हमेशा रोका और भारत का विकास नहीं होने दिया। लेकिन फिर भी भारत के जनता अधिकतर स्वदेशी अपनाओ के नारे को साकार करती रही। 

       स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोकतंत्र की बांसुरी बजने लगी। विकास की गंगा बहने लगी। और अपना देश अपना उत्पादन की भावना जनमानस में घर कर गयी। 

        आज हम विकासोन्मुख होने के बावजूद विकसित देशों की दौड़ में शामिल हो चुके हैं। परन्तु बिडम्बना यह है कि हमारा औद्योगिक उत्पादन विदेशी सामानों की अपेक्षाकृत महँगा दिखाई देता चला आ रहा है।    

        ऐसी स्थिति में ग्राहक प्रतिस्पर्धात्मक नीति अपनाते हुए  विदेशी सस्ता सामान खरीदने को विवश हो जाता है। विदेशी सामानों के आयात में हमारी रोज की आवश्यकताओं का अधिकांश सामान चीन से आता है। अन्य देशों की अपेक्षा चीन का सभी प्रकार का सामान सस्ता होता है। चीन में लेबर वहुतायत में है। वहाँ  घर- घर में सामान बनाने की सुविधा प्राप्त है।  कर-प्रणाली का कोई जाल बुना हुआ नहीं है। 

         विश्व में संख्या बल के अनुसार चीन नंबर -१ का होने के बावजूद अपनी जनता का पेट भरकर दुनिया के लगभग सभी देशों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। 

       आखिर चीन का तैयार सामान सस्ता क्यों होता है ? और हमारे देश का तैयार सामान महँगा  क्यों होता है ?   

         यदि हमारे देश की कर-प्रणाली और कार्यप्रणाली में सुधार हो जाये तो हमारे देश का उत्पादन चीन से सस्ता नहीं तो लगभग चीन के बराबर ही हम खड़े हुए दिखाई देंगे। 

      इस सब के बावजूद अभी विस्तारवादी चीन ने हमारे देश की सीमाओं पर अतिक्रमण करने का प्रयास किया, जो विफल कर दिया गया। कोरोना कोविद -१९ ये चीन के द्वारा हमारे देश को कमज़ोर करने के लिए उसकी इस चालाकी  के ऊपर भी हमारा नियंत्रण हो चुका है। भारत की जनता एक होना जानती है। उसने एक होकर दिखा दिया है। इस प्रकार यदि भारत का शासन /प्रशासन भ्रष्टाचार मुक्त हो जाये तो हमारे भारत देश का उत्पादन चीन से भी सस्ता हो जायेगा। जब उत्पादित वस्तुएं चीन से सस्ती होंगी ,तो भारतवासी विदेशी सामान खरीदना स्वतः ही बंद कर देंगे। चीन की मक्कारियों के कारण ही भारत की जनता ने चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करके स्वदेशी अपनाओ का नारा दिया।

हमारा अनुरोध है कि आप भी स्वदेशी अपनाये।

        यशपाल सिंह आर्य

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